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पहले जानो, फिर जानी हुई बात पर श्रद्धा करो

जैन आचार्यों ने सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र- इस रत्नत्रयी को समस्याओं का समाधान माना है। यही मुक्ति का मार्ग है। पहले जानो, फिर जानी हुई बात पर श्रद्घा करो, आस्था का अनुबंध करो और फिर उसका आचरण करो। यह भी समाधान का एक मार्ग है।

आदमी जानना नहीं चाहता। वह पढ़ता है, पर जानता नहीं। जानने का तात्पर्य है अपने आपको जानना। जो अपने आपको जानता है, वह सबको जान लेता है। जो अपने आपको नहीं जानता, वह बहुत जानकर भी थोड़ा जान पाता है। जो अपने आपको जानता है, वह थोड़ा जानकर भी बहुत जान लेता है।

यह अध्ययन की सरल पद्घति है। यह अंतर्दृष्टि को जगाने की पद्घति है। जब ज्ञान आत्मगत हो जाता है, तब बाहरी ज्ञान को पढ़ने की इतनी जरूरत नहीं होती। एक व्यक्ति पढ़कर जानता है। पर अंतर्दृष्टि से जितना जाना जाता है, उतना सौ वर्ष तक पढ़कर भी नहीं जाना जा सकता। ज्ञान की असीम शक्ति हमारे भीतर है। जब उसका द्वार खुल जाता है, तब उसमें सब कुछ समाविष्ट हो जाता है।

पहला है सम्यक ज्ञान। दूसरा है सम्यक दर्शन। दर्शन का अर्थ है अनुभव करना। बहुत बड़ा अंतर है जानने में और अनुभव करने में। एक आदमी ने एक बात पढ़कर जान ली। परंतु जब तक वह उसका स्वयं अनुभव नहीं कर लेता, तब तक जानी हुई बात अधूरी ही रह जाती है।

पंडित ने पंडिताइन से कहा- कल मंगलवार है। अमुक ग्रहों का योग है। मैं एक अनुष्ठान करूंगा। उससे हमारी गरीबी समाप्त हो जाएगी। मैं ठीक समय पर मंत्र का उच्चारण करूंगा। उस समय तुम हंडिया में ज्वार के दाने डाल देना। वे उस योग के प्रभाव से मोती बन जाएंगे। पंडिताइन ने बात जान ली, सुन ली। मन में आस्था नहीं हुई, संदेह नहीं मिटा। ज्ञान हुआ, पर दर्शन नहीं हुआ। पड़ोसिन ने यह बात सुन ली थी। मंगलवार का दिन। ठीक समय पर मंत्र का उच्चारण। पंडिताइन ने पहले से तैयारी नहीं की थी। वह हड़बड़ाकर उठी। ज्वार ले आई। समय निकल चुका था। ज्वार के दाने मोती नहीं बने।

पड़ोसिन जागरूक थी। पूरी तैयारी पहले से ही कर रखी थी। उसने ठीक समय पर ज्वार के दाने डाले। सारे मोती बन गए। वह पंडितजी के घर कटोरी भर मोती ले गई। पंडित जी ने देखा। पंडिताइन भी आंखें फाड़कर देखने लगी। उसने सोचा- मैं भी उस समय ज्वार के दाने डाल पाती तो मोती बन जाते। पर अब क्या हो? न मंगलवार, न मंत्र और न मोती।

जानकर भी अनुभव नहीं होता, दर्शन नहीं होता तो समस्या का समाधान नहीं होता, ज्वार के दाने मोती नहीं बनते। दर्शन है समस्या के समाधान का मार्ग। दर्शन का अर्थ है-आस्था का दृढ़ीकरण, जानना और जानी हुई बात का अनुभव करना।

तीसरा मार्ग है आचरण, अनुभव का क्रियान्वयन करना। जब ये तीनों समन्वित होते हैं, तब मुक्ति दूर नहीं होती। मुक्ति का वास्तविक अर्थ है-अपने संस्कारों का मिट जाना, कषायों का समाप्त हो जाना, आश्रव का समाप्त हो जाना।

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