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जट्टा आई बैसाखी..

अप्रैल के महीने में जब खेतों में खड़ी गेंहू की फसल पक जाती है, आसमान पर सूरज का ताप चढ़ने लगता है तो पंजाब में बैसाखी की तैयारियां होने लगती हैं। लोकगीतों में इसे इस तरह से कहा गया है-

फसलां दी मुक गई राखी, जट्टा आई बैसाखी..

यानी अब फसल पक चुकी है उसकी रक्षा करने का समय अब खत्म हो गया है क्योंकि बैसाखी आ गई है। बैसाखी के बाद फसल की कटाई का काम शुरू हो जाता है। पकी सुनहली फसल की खुशी मनाने के लिए पंजाब में जगह-जगह बैसाखी के मेले लगते हैं। यह नाचने गाने का मौका है क्योंकि इसके  बाद खेत में फसल कटाई के मेहनत भरे दिन शुरू होने वाले हैं। मेलों में जाने वाले लोगों के लिए रास्तों में जगह जगह छबीलें लगाई जाती हैं, जहां लोगों को ठंडा पानी और शरबत पिलाने की व्यवस्था होती है।

बैसाखी के इस उल्लास में एक धार्मिक पक्ष भी जुड़ा हुआ है। बैसाखी के दिन ही सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। जहां उन्होंने बैसाखी मेले के दौरान केसगढ़ गुरुद्वारे में जुटे भक्तों के सामने पांच प्यारों को चुनकर उन्हें सिख धर्म की दीक्षा दी थी, और बाद में उनसे खुद भी दीक्षा ली थी। पहले उन्हें अमृत छकाया और फिर खुद उनसे अमृत छका। यह ऐसा मोड़ था जिसने पूरे पंजाब के इतिहास को बदल दिया। दुनिया भर के गुरुद्वारों में आज भी उसकी याद में आयोजन होते हैं।          

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