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विवादों में पिघली ऐवरेस्ट की ऊंचाई

विवादों में पिघली ऐवरेस्ट की ऊंचाई

भारत में अगर आप सामान्य ज्ञान की परीक्षा दें और उसमें ऐवरेस्ट की ऊंचाई पूछी जाए तो आप 8848 मीटर बताकर पूरे अंक हासिल कर सकते हैं। लेकिन ऐसी ही परीक्षा चीन में हो और आप ऐवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर बताएं तो आप फेल हो सकते हैं। जी हां ऐवरेस्ट की ऊंचाई को लेकर ऐसे मतभेद हालांकि बीच-बीच में उठते रहे हैं लेकिन चीन और नेपाल ने पिछले सप्ताह एक बैठक में इस मतभेद का एक नायाब समाधान ढूंढ़ लिया है। दोनों देश इस बात पर सहमत हो गए हैं कि वे ऐवरस्ट की ऊंचाई पर एकमत नहीं हैं। जहां एक ओर चीन 2005 में उसके सर्वे के अनुसार ऐवरेस्ट की ऊंचाई 8844.43 मीटर ही मानेगा, जबकि नेपाल 1955 के भारतीय सर्वे को मानते हुए शिखर की ऊंचाई 8848 मीटर को ही मान्यता देगा।

नेपाल में सागरमाथा और तिब्बत में चोमोलुंग्मा नाम से पहचाने जाने वाले माउंट ऐवरेस्ट की समु्द्र तल से ऊंचाई 8848 मीटर है। 1856 में ग्रेट ट्रिग्नोमेट्रिक सर्वे ऑफ इंडिया में पहली बार इस पर्वत की ऊंचाई के बारे में उल्लेख किया गया। उस समय पीक 15 नाम से उल्लेखित एवरेस्ट की ऊंचाई 8840 मीटर बताई गई।  1865 में जॉर्ज एवरेस्ट के सम्मान स्वरूप पीक 15 का नाम बदलकर माउंट एवरेस्ट रखा गया। जॉर्ज 1830 से 1843 के बीच सर्वेयर जर्नल ऑफ इंडिया थे। जॉर्ज नहीं चाहते थे कि इस शिखर का नाम उनके नाम पर रखा जाए लेकिन फिर भी ऐसा किया गया।

1955 में एक भारतीय सर्वे और 1975 में चीनी गणना के अनुसार एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर बताई गई, जो आगे चलकर इस पर्वत शिखर की पहचान बन गई। दोनों ही बार बर्फ की परत को भी ऊंचाई में मापा गया न कि सिर्फ पर्वत की ऊंचाई को। भारतीय सर्वे दल ने इसके लिए सर्वे और इंजीनियरिंग के काम में आने वाले एक महत्वपूर्ण औजार थियोडोलाइट का प्रयोग किया। कई महीनों की गणनाओं के बाद आखिर 9 अक्टूबर 2005 को नेपाल और चीन ने एवरेस्ट की ऊंचाई 8,844.43 मीटर (29,017.16 फुट) बताई। इस गणना में पहाड़ की असली ऊंचाई को मापा गया, जबकि इसमें पहाड़ पर जमी बर्फ की ऊंचाई की गणना नहीं की गई। चीनी टीम ने बर्फ के साथ ही एवरेस्ट की ऊंचाई मापी जो 8848 मीटर मापी गई, लेकिन साथ में कहा गया कि बर्फ की परत के कम या ज्यादा होने से इसकी ऊंचाई में फर्क आ सकता है। 1999 में अमेरिकी दल ने जीपीएस का इस्तेमाल कर एवरेस्ट की ऊंचाई मापी और इस माप में पर्वत 3 फुट और उठकर 8850 फुट ऊंचा हो गया। अमेरिकी दल ने बताया कि इसमें 3 फुट बर्फ थी।

कहा जाता है कि हिमालयी क्षेत्र की प्लेट के लगातार उत्तर-पूर्व की ओर खिसकने के कारण हिमालय की ऊंचाई बढ़ रही है। प्लेट के खिसकने के कारण माना जाता है कि पहाड़ प्रतिवर्ष 4 एमएम ऊंचे होने के साथ ही 3 से 6 एमएम उत्तर-पूर्व की ओर भी खिसक जाते हैं।

हिमालय के उद्भव के लिए जिस भौगोलिक कारण को जिम्मेदार माना जाता है उसके अनुसार उत्तर में अंगारालैंड और दक्षिण में गोंडवानालैंड नाम के दो अलग-अलग क्षेत्र थे जिनके बीच में टेथिस सागर था। दोनों ओर से नदियां पानी और तलछट बहाकर टेथिस सागर में लाती थीं। कालातंर में भूगर्भीय हलचलों के कारण अंगारालैंड और गोंडवानालैड करीब आए और टेथिस सागर के स्थान पर हिमालय का उदभव हुआ।

दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में एवरेस्ट के बाद नाम के2 का आता है, जिसे गॉडविन ऑस्टिन नाम से भी जाना जाता है। के2 की ऊंचाई 8611 मीटर मापी गई और अब यह पीओके में कराकोरम श्रेणी में आती है। 8586 मीटर ऊंची कंचनजुंगा दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है।

भारत की सबसे ऊंची चोटी कंचनजुंगा है और 7824 मीटर ऊंची नंदा देवी भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है। भारत की तीसरी सबसे ऊंचे पर्वत कामेट की ऊंचाई 7756 मीटर है।

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