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दो टूक (09 अप्रैल, 2010)

एक और बीएमडब्ल्यू कांड ने गुरुवार सुबह को खून से रंग डाला। लगता है महंगी गाड़ियों की पावर, चलाने वाले के सर चढ़कर बोलती है। लापरवाही से होने वाली दुर्धटनाओं में अमूमन इन्हीं गाड़ियों का नाम आता है। अपने देश में सड़क और ट्रैफिक का बंदोबस्त इतनी तेज रफ्तार की इजाजत नहीं देता।

लेकिन हैसियत का गुमान लोगों का विवेक हर लेता है। साधारण राहगीर मारे जाते हैं। इससे भी ज्यादा शर्मनाम व्यवहार अकसर पुलिस की तरफ से होता है। एक्सीडेंट का जायजा लेते वक्त वह घायलों के बजाय मामले से जुड़े लोगों की हैसियत को तरजीह देती है। घायल होने वाला हैसियतदार हो तो जान बच सकती है वरना गरीब की किस्मत में तो रोज मरना बदा है।

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