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पुलिस सुधार ही सबसे बड़ा समाधान

पिछले एक साल में केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों के 180 जवानों की जान वामपंथी अतिवादियों ने ली है, इनमें 74 तो अकेले तीन दिन पहले छह अप्रैल को मारे गए। अगर सिर्फ आंकड़ों के ठंडेपन के हिसाब से सोचें तो देश में हर रोज जितने लोग भुखमरी से और दूसरे रोगों से मरते हैं, उनके मुकाबले यह संख्या कुछ भी नहीं है। पहली तरह के आंकड़े राज्यसत्ता को मिलने वाली चुनौती के हैं और दूसरी तरह के आंकड़े बताते हैं कि राज्यसत्ता अपना आधार कहां खो रही है। लेकिन बुलेट से होने वाली मौतों में नाटकीयता ज्यादा होती है।

दंतेवाड़ा के घने जंगलों में बसे चिंतलनार गांव के पास छह अप्रैल को हुए नरसंहार के साथ एक और खुफिया नाकामी का आरोप जुड़ गया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इन अतिवादियों के पास काफी स्थानीय समर्थन है जिसकी वजह से उन्हें सीआरपीएफ की तैनाती की खुफिया जानकारी मिलती रहती है। इसके अलावा यह व्यवस्था की वह आमफहम नाकामी है जो पिछली गलतियों से कभी नहीं सीखती। जब सारी व्यवस्थाएं टूट रही हों तो यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि खुफिया व्यवस्था कुछ बेहतर नतीजा देगी।

सीआरपीएफ कोई स्थानीय बल नहीं है। उसके पास न स्थानीय ज्ञान है, न स्थानीय खुफिया तंत्र है। न उसे स्थानीय भूगोल की जानकारी है और न सामाजिक तौर तरीकों की। वह स्थानीय आबादी में घुल-मिल जाए इसकी संभावना काफी कम है। इसके मुकाबले अच्छे साजो सामान और अच्छे प्रशिक्षण वाला कोई स्थानीय बल इससे ज्यादा अच्छी तरह से निपट सकता है।

अगर स्थानीय बल के पास अच्छा प्रशिक्षण और अच्छा साजो सामान नहीं है और उसके साथ एक ऐसा बल तैनात कर दिया जाता है जिसके पास स्थानीय ज्ञान नहीं है तो इसका अर्थ है कि तबाही की भूमिका तैयार हो गई है। अगर आप लगातार केंद्रीय बलों को मरने के लिए भेजते हैं तो इससे जवानों के हौसले पस्त होते हैं और सरकार की छवि खराब होती है। दूसरी तरफ अतिवादी इसे अपनी जीत के तौर पर देखते हैं।

फिलहाल यह मांग चल रही है कि दुश्मन को नेस्तनाबूत करने के लिए सेना और वायुसेना को तैनात किया जाए। इससे बड़ी गड़बड़ी और कोई नहीं होगी। कुछ नाटकीय करते हुए दिखने की प्रवृत्ति से हमें बाज आना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारी सेनाएं पेशेवर बल हैं और उनका सारा प्रशिक्षण बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए हुआ है, उन्हें हवाई फायर करने का प्रशिक्षण नहीं मिला।

स्थानीय ज्ञान उनके पास सुनिश्चित नहीं है, और उनके ऑपरेशन से मरने वालों की संख्या ज्यादा भी हो सकती है जिससे मसला जटिल ही होगा। अगर हम सेना का इस्तेमाल स्थानीय बागियों को दबाने में खत्म करते हैं तो सेना पार के दुश्मन से लड़ने की इसकी क्षमता में कमी आती है।

सेना युद्ध में तो जीत दिला सकती है लेकिन आतंक के खिलाफ लड़ाई में जीत सुनिश्चित नहीं कर सकती। अफगानिस्तान में हाल का अमेरिका का अनुभव और पहले सोवियत संघ का अनुभव तो यही कहता है। हमारा अपना अनुभव दोनों ही तरह का रहा है।

पूर्वोत्तर के राज्यों और जम्मू कश्मीर में जो तरीका कामयाब रहा वह नक्सल प्रभावित राज्यों में नहीं भी सफल हो सकता। बागियों से निपटना एक कठिन काम होता है। इसके लिए एक तो आतंकवादियों के विरुद्ध लगातार लड़ाई का बड़ा दमखम चाहिए, दूसरे टिकाऊ राजनैतिक इच्छाशक्ति होनी चहिए जो किसी सरकार के जीवनकाल पर ही निर्भर न हो। बगावत को खत्म करने की लड़ाई दिमाग की लड़ाई होती है और यह दिमाग के लिए भी होती है।

अगर हमें इस जंग को जीतना है तो सबसे पहले इसे समझना होगा कि यह लंबी लड़ाई है, इसमें कोई ग्लैमर नहीं है और यह उतनी ही गंदी है जितनी कि एक बागी की लड़ाई। उस व्यक्ति की जो अपने कैरियर के कुछ ही समय के भीतर रॉबिन हुड नहीं रह जाता। नष्ट करना काफी नहीं है, निर्माण करना जरूरी है। बगावत को खत्म करने के किसी भी अभियान के लिए पांच चीजें जरूरी होती है- खोजो, समझो, मारो, विकास करो और वार्ता करो।

खोजने और समझने के लिए प्रभावशाली स्थानीय खुफिया तंत्र जरूरी है जिसके साथ ही तुरंत कार्रवाई की व्यवस्था भी जुड़ी हो। इसके बिना सरकार अंधेरे में गोलियां चलाती रहेगी और जितने अतिवादियों को वह मारेगी उससे ज्यादा पैदा हो जाएंगे। उन्हें खत्म करने के दौर में केंद्रीय बलों की जरूरत पड़ सकती है लेकिन अच्छे प्रशिक्षण और समुचित तौर पर हथियारबंद पुलिस का कोई विकल्प नहीं है।

सबसे पहले तो यह जरूरी है कि हम अपनी पुलिस में नई जान फूंके। यह ऐसा बल है जिसे सबसे ज्यादा नजरंदाज किया गया है, जिसे सबसे कम पैसे मिलते हैं, जिस पर काम का भारी बोझ है और जिसे खासा बदनाम किया जाता है। इसके आत्मविश्वास और गौरव को लौटाना सबसे जरूरी है। जब स्थानीय आबादी से व्यवहार करने की इसकी क्षमता बढ़ेगी तो खुफिया सूचनाएं अपने आप आने लगेंगी। दशकों से यह देश पुलिस सुधार की बात कर रहा है लेकिन कभी कुछ होता नहीं है।

दूसरे पुलिस को नई तकनीक के हथियार और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। पैसे की कमी और राजनैतिक उदासीनता के कारण इस काम को लगातार नजरंदाज किया जाता रहा है। यह मुमकिन है कि कुछ मामलों में कुछ राज्यों में पुलिस बलों के प्रशिक्षण के लिए सेनाओं की मदद की जरूरत भी पड़े।

तीसरे, अतिवादी संगठनों को तबाह करना ही काफी नहीं है। साथ ही यह भी जरूरी है कि वहां जीवन के टूट चुके तारों को फिर से जोड़ा जाए, अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा किया जाए, शोषण को रोका जाए। जब भी आप बगावत पर जीत हासिल कर लें यह सब साथ ही साथ होना चाहिए। अगर यह नहीं होता तो बगावत फिर सर उठाएगी। इसके लिए सिर्फ सरकार के हथियारबंद समूहों को ही नहीं बल्कि उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, संचार जैसी एजेंसियों को भी सक्रिय करना होगा।

चौथे, आतंकवादी यह कहते हैं कि वे जनता के लिए लड़ रहे हैं, इस जनता को सरकार की कार्रवाई का हिस्सा बनाना होगा। मीडिया भी इस लड़ाई का आवश्यक अंग है। ऑपरेशन सफल हो या न हो, मीडिया कवरेज आतंकवादियों के लिए प्राणवायु का काम करता है। अगर आप भय का माहौल बनाते हैं तो यह भी आतंकवादियों की ही जीत है। इस लिहाज से मीडिया मैनेजमेंट जरूरी है ताकि वह खबरें दे लेकिन सनसनी न फैलाए। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि ऐसे अभियानों में तालमेल के लिए नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर पूरी तरह से सक्रिय हो। यह एक लंबी लड़ाई है जिसका कोई शॉर्टकट नहीं है।

लेखक रॉ के प्रमुख रह चुके हैं।

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