DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बहुत छका रही है वीडियो पाइरेसी

वीडियो पाइरेसी का तकलीफदेह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। हाल में तमिल फिल्म उद्योग के निर्माता वाई रवीचंद्रन और निदेशक सुरेंद्र रेड्डी ने इस मुद्दे पर आमरण अनशन तक कर डाला। देश में बालीवुड के बाद तमिल फिल्म उद्योग अपने आकार के लिहाज से दूसरे नंबर पर है। इसे हर साल 450 करोड़ रुपए का नुकसान पाइरेसी के कारण होता है। इसमें भी 35 फीसदी नुकसान पाइरेसी के वीसीडी के कारण होता है।

इस दौरान राज्य सरकार को भी पाइरेसी के कारण राजस्व की हानि होती है, क्योंकि फिल्म रिलीज होते ही पाइरेसी वाले डीवीडी बाजार में बिकने लगते हैं। इन दो निर्माताओं के अनशन ने पूरे फिल्म उद्योग के लिए उनके समर्थन में खड़े होने और सरकार से समाधान ढूंढने की मांग करने का बिगुल बजा दिया है। अनशन के बाद राज्य सरकार ने तत्काल प्रतिक्रिया जताई।

सरकार की सूचना और सिनेमटोग्राफी मंत्री जे गीता रेड्डी ने वीडियो तस्करी के खिलाफ चंद महीनों के भीतर एक अध्यादेश लाने का वादा कर डाला। उन्होंने कहा कि तीन महीने के भीतर इस बात की गारंटी करने के लिए कदम उठाए जाएंगे कि राज्य की सभी वीडियो लाइब्रेरियों के पास वैध लाइसेंस हो।

लेकिन यह वादा हास्यास्पद है कि तमिलनाडु और कर्नाटक के मौजूदा कानूनी प्रावधानों को आंध्र प्रदेश में भी लागू कराने के बारे में विचार किया जाएगा। वीडियो पाइरेसी से निपटने के प्रयासों से बावजूद इससे होने वाले राजस्व की हानि हर साल बढ़ती ही जा रही है। सन 2008 में यह नुकसान 1000 करोड़ तक पहुंच गया जो कि उद्योग के कुल राजस्व का 15 प्रतिशत तक था।

तमिलनाडु ने पाइरेसी को गुंडा कानून के तहत ला दिया और इससे निपटने के लिए सीबी-सीआईडी के भीतर एक विशेष सेल की स्थापना कर डाली। यह सेल अच्छा काम कर रहा था और इसने पहले वाले साल के 2900 मुकदमों के मुकाबले सन 2009 में 3600 मुकदमे दर्ज किए। इसने पाइरेसी वाली डीवीडी और उनके तैयार करने में लगने वाले उपकरण जब्त किए पर उससे यह खतरा कम नहीं हुआ। इन सब के बावजूद तस्करी इतनी बढ़ गई कि राज्य पुलिस ने दावा किया कि वह 15 साल की लड़ाई हारने की स्थिति में पहुंच गई है।

उनका यह दावा उनके अनुभव पर आधारित था। दरअसल किसी को भी गुंडा कानून के तहत पकड़ना आसान भी नहीं होता क्योंकि जो कोई पहली बार अपराध करता है उसे इस कानून के तहत पकड़ा नहीं जा सकता।
लेकिन इस साल जनवरी में हुई एक घटना ने मामले को काफी तूल दे दिया। पोंगल के मौके पर रिलीज होने जा रही हाई प्रोफाइल फिल्म ‘जग्गूभाई’ आए उससे पहले पाइरेसी करने वालों ने उसे इंटरनेट पर रिलीज कर दिया।

इस घटना से व्यथित फिल्म निदेशक केएस रविकुमार ने झुंझला कर कहा, ‘यह तो हत्या है। मुझे फिल्म बनाने में 15 करोड़ रुपए और दो साल तक कठिन मेहनत करनी पड़ी। मैं इन बेदर्द लोगों के क्रूर कारनामे को समझ नहीं पा रहा हूं।’ इस घटना के बाद तमिल फिल्म उद्योग के दिग्गज सड़क पर आ गए और इस गैरकानूनी काम को रोकने की मांग की।

वीडियो पाइरेसी रोक पाने में तमिलनाडु की दिक्कतों को महसूस कर तेलुगू फिल्म निर्माताओं ने यह काम खुद ही करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने सात साल पहले खुद ही तस्करी विरोधी सेल का गठन किया और प्रोडय़ूसरों को इस मामले पर समझाने में लग गए। उन्होंने फिल्म रिलीज होने के पहले, प्रिंट पर वाटरमार्क लगाने का सुझाव दिया, पुलिस को सूचनाएं दीं और प्रदर्शन करने वालों को अपने कर्मचारियों पर निगाह रखने के लिए कहा।

लेकिन यह सेल भी नाकाम हो गया क्योंकि इन उपायों से अपराधी का पता तो चल सकता था लेकिन तस्करी वाले सीडी के जारी हो जाने बाद। इसलिए अब यह उद्योग दोतरफा रणनीति पर विचार कर रहा है। पहली रणनीति उद्योग के आधारभूत ढांचे के भीतर के छेद भरने के बारे में और दूसरी रणनीति कठोर कानूनों को लागू करने के बारे में।

वीडियो पाइरेसी रोकने के लिए सरकार अभी असरदार कानूनी ढांचा बना ही रही है, इस बीच किसी भी फिल्म को पांच मिनट में डाउनलोड करने की सस्ती तकनीक आ गई है। बड़े बजट की बड़े स्टारों वाली फिल्में कई वेबसाइट पर अपलोड की जाती हैं और रिलीज होने के एक दिन के भीतर ही वे मुफ्त डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध होती हैं।

कोई परिवार महज 25 रुपए की पाइरेटेड सीडी पर फिल्म देखने को बड़ा अपराध न मानता हो लेकिन ऐसा करके वह उन हजारो परिवारों के पेट पर लात मार रहा होता है जो फिल्म उद्योग पर निर्भर हैं।

radha.viswanath@gmail.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बहुत छका रही है वीडियो पाइरेसी