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बेलगाम महंगाई

महंगाई से पहले जनता परेशान थी अब सरकार और अर्थशास्त्री भी परेशान हैं। कोसी के पानी की तरह महंगाई उतरने के बजाय लगातार चढ़ती ही जा रही है। अभी दो अप्रैल को सरकार ने एलान किया था कि महंगाई रोकने के जो उपाय किए गए हैं उसके अच्छे नतीजे आ रहे हैं। लेकिन गुरुवार को 27 मार्च को खत्म हुए पिछले हफ्ते के बारे में महंगाई के जो आंकड़े जारी हुए वे चौंकाने वाले हैं।

खाद्य वस्तुओं की महंगाई की दरें 16.35 प्रतिशत से बढ़कर 17.70 तक पहुंच गई हैं। इसका असर मुद्रास्फीति की कुल दर पर भी पड़ने वाला है। आशंका है कि फरवरी में जो मुद्रास्फीति दर 9.89 प्रतिशत थी वह ताजा आंकड़ों के आधार पर दो अंकों तक पहुंच सकती है। सरकार दावा कर रही थी कि उसके उपायों से खाद्य पदार्थो के दाम घट गए हैं लेकिन आलू, प्याज और कुछ सब्जियों को छोड़कर दाल, दूध, फल और गेहूं-चावल सभी चीजों के दाम बढ़ने से वह हैरान है।

सरकार इस स्थिति से बेचैन है। क्योंकि महंगाई और विकास दर दोनों दो अंकों में पहुंच जाएं ऐसा नहीं हो पाएगा। केंद्र सरकार अपनी इस चिंता को राज्य सरकारों से साझा करने और कारगर उपाय करने के लिए उनके साथ बैठक कर रही है।

इस बीच विपक्षी दलों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि महंगाई आंदोलन से नहीं कम होगी तो विपक्षी दल कह रहे हैं कि सरकार उनकी सुन नहीं रही है। अनुमान है कि हाल में खाद्य वस्तुओं के दामों की बढ़ोतरी पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने के कारण हुई है। विपक्षी दल इस बढ़ोतरी को वापस लेने की बात कर रहे हैं। उनकी मांग जरूरी चीजों का वायदा कारोबार रोकने की है। इसी के साथ वे सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने की भी मांग कर रहे हैं।

महंगाई रोकने के लिए मौद्रिक नीति के उपकरण का इस्तेमाल करने का सुझाव भी दिया जा रहा है। पिछली बार जब उत्पाद कर की छूट घटाई गई थी तो कुछ असर पड़ने की उम्मीद थी। इसी सिलसिले में अब ब्याज की दरें और कैश रिजर्व रेश्यो बढ़ाने का भी सुझाव दिया जा रहा है। इससे बाजार में मुद्रा की तरलता कम होगी और महंगाई घट सकती है।

लेकिन हमारे वित्त मंत्री लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हमारे देश की महंगाई मौद्रिक नीति से उत्पन्न महंगाई नहीं है। वह खाद्य पदार्थो के उत्पादन कम होने और उनकी सप्लाई कम होने से बनी है। देश को 1.8 करोड़ टन दाल की जरूरत है तो पैदावार महज 1.4 करोड़ टन की है। इसलिए हमें 40 लाख टन दाल आयात करनी पड़ रही है। इसी तरह 90 लाख टन चीनी और 20 लाख टन खाद्य तेज के आयात की भी दरकार है। 

जाहिर है अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन चीजों की कीमतें ज्यादा होने के चलते इन वस्तुओं के बाजार में आने के बाद भी दाम कम नहीं हो पाते। लेकिन मामला महज खाद्य वस्तुओं तक ही नहीं सीमित है। गैर खाद्य वस्तुओं की घरेलू मांग भी काफी है और उनकी कीमत बाहर कम नहीं है। ऐसे में सरकार को कई मोर्चो पर प्रयास करने होंगे। फिलहाल सरकार रबी की अच्छी फसल के चलते राहत की बड़ी उम्मीद लगाए हुए है। ऐसे में उत्पादक किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों को ध्यान में रखकर किया जाने वाला सरकार का हस्तक्षेप कारगर हो सकता है।

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