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सिर्फ नेता ही नहीं चाहिए

मैल्कम टर्नबुल ने इस साल संसद छोड़ने का फैसला किया था। उनसे कुछ वक्त पहले जॉन ह्यूसन ने भी संसदीय राजनीति से किनारा कर लिया था। राजनीति में लोग आते-जाते रहते हैं। लेकिन देश की इन दो शख्सीयतों का राजनीति छोड़ना बेहतर संकेत नहीं है। टर्नबुल कानून और कारोबार की शख्सीयत हैं। ह्यूसन मर्चेट बैंकर हैं। उनका राजनीति छोड़ना बताता है कि और क्षेत्रों से आने वाली शख्सीयतों को अपनी पार्टियां पचा नहीं पाती हैं। इस मामले में लेबर और लिबरल पार्टी में कोई फर्क नहीं है। टर्नबुल तो लिबरल की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन आखिरकार उन्हें टॉनी एबट के पक्ष में छोड़ना पड़ा। अगर दोनों की शख्सीयत को देखा जाए तो टॉनी कहीं भी टर्नबुल के आगे टिकते नहीं हैं। टॉनी ने कुछ वक्त पत्रकारिता जरूर की है। लेकिन उसके अलावा वह वाया छात्र राजनीति से होते हुए यहां तक पहुंचे हैं। अपनी संसदीय राजनीति में हर क्षेत्र से लोग आने चाहिए। तभी हमारी संसद एक मुकम्मल मंच बन पाएगी।
सिडनी मॉर्निग हेरल्ड

इमर्जेसी नहीं, बातचीत रास्ता है
हमारा विपक्ष अपनी हदों को पार कर रहा है। यह सही है कि वह लोकतंत्र बहाली की मांग कर रहा है। लेकिन देश की कानून व्यवस्था का खयाल तो उसे रखना ही होगा। यूनाइटेड फ्रंट फॉर डेमोक्रेसी अगेन्स्ट डिक्टेटरशिप यानी यूडीडी अब उन ठिकानों पर भी अपने विरोध प्रदर्शन को ले गई है, जहां आम आदमी परेशान होता है। रोजमर्रा के कारोबार पर असर होता है। सरकार की खिलाफत तो समझ में आती है, लेकिन जनता के दुख-दर्द को तो उन्हें समझना ही चाहिए। सरकार ने भी इमर्जेंसी लगा दी है। लेकिन वह कोई हल नहीं है। लोकतंत्र की बहाली तो बातचीत से ही हो सकती है। उस पर दोनों पक्षों को सोचना चाहिए।
बैंकॉक पोस्ट

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