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फौजी कार्रवाई से पहले सोचिए

भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए इससे बड़ी चुनौती क्या होगी? दंतेवाड़ा के जंगलों में सुरक्षा बलों को जो चोट लगी है, वह शारीरिक नहीं भावनात्मक है। कुछ लोगों का कहना है कि अब एक बड़ी फौजी कारवाई का समय आ गया है। हमें वायुसेना की मदद लेनी चाहिए। ड्रोन पैटर्न के हमले करने चाहिए। उनका पूरी तरह सफाया होना चाहिए वगैरह। यह करने का मौका फिलहाल नहीं हैं। पहले देखना चाहिए कि दंतेवाड़ा में गलती कहां हुई। 

माओवादियों के साथ संवाद की संभावना भी फिलहाल खत्म हो गई है। हाँ यह विचार करने का मौका ज़रूर है कि क्या इस समस्या का फौजी समाधान सम्भव है? समस्या के दीर्घकालीन हल की ओर हमें ध्यान   देना चाहिए। यह तफतीश और होनी चाहिए कि क्या उन्हें किसी विदेशी ताकत का सहारा भी मिल रहा है। उनके हथियार इतना संकेत तो करते हैं कि तैयारी मामूली नहीं है।

अरुंधति रॉय ने हाल में लिखा है, दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़ों में होती है और बागी (माओवादी) वर्दी पहनते हैं। गाँव खाली पड़े हैं और जंगलों में लोग भरे पड़े हैं। इन्द्रावती नदी के पार के माओवादी अधिकृत इलाके को पुलिस पाकिस्तान कहती है। अरुंधति रॉय की माओवादियों के प्रति हमदर्दी जग-जाहिर है। पर यह छिपी बात नहीं कि लोगों के मन में अलगाव है। पिछले डेढ़-दो साल में यह अलगाव और बढ़ा है।

हिंसा पर काबू पाने के लिए इनके समर्थन और सहयोग की ज़रूरत है। बंगाल के लालगढ़, झारखंड और छत्तीसगढ़ में आंध्र प्रदेश से आए माओवादी कार्यकर्ता फौजी ट्रेनिंग दे रहे हैं। दंतेवाड़ा हत्याकांड की योजना के पीछे भी आंध्र के चार माओवादियों का नाम लिया जा रहा है।

माओवादी या नक्सली आंदोलन भारत की आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था के अंतर्विरोधों की कहानी है। एक तरफ यह हमारे राष्ट्र राज्य की विसंगतियों को रेखांकित करता है वहीं वामपंथी पार्टियों के भटकाव की ओर इशारा करता है। आज़ादी के वक्त भारत के कम्युनिस्ट भ्रम में थे।

उन्हें समझ में नहीं आता था कि यह आज़ादी है या नहीं। इसी भ्रम में यह पार्टी 11 अप्रैल 1964 को टूट गई। असंतुष्ट सदस्यों की निगाह में सीपीआई संसदीय पद्धति के बहाव में बह रही थी। उन्होंने एक नई पार्टी बनाई, सीपीआई-मार्क्सवादी। सीपीएम का विश्वास था कि संसदीय पद्धति की जरूरत सिर्फ टैक्टिकल है। उससे आधारभूत क्रांति नहीं हो पाएगी।

उस वक्त तक शायद सीपीएम के नेतृत्व को यकीन नहीं था कि तीन बरस बाद ही उसे सरकार में शामिल होना होगा। 2 मार्च 1967 को बंगाल की पहली संयुक्त मोर्चा सरकार बनते ही सीपीएम के अपने असंतुष्ट पैदा हो गए और उन्होंने उत्तरी बंगाल के नक्लबाड़ी इलाके में किसानों का आंदोलन छेड़ दिया। उस आंदोलन के गर्भ से 1969 में एक और पार्टी निकली जिसका नाम था सीपीआई-एमएल। इस पार्टी से भी कई शक्लों के संगठन बने।
आंध्र में इसका पीपुल्स वॉर ग्रुप सबसे सक्रिय था। सन 2004 में इस ग्रुप ने एमसीसी के साथ मिलकर सीपीआई(माओवादी) का गठन किया। इसके प्रमुख है मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति। और एक प्रमुख कार्यकर्ता हैं कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी।

कम्युनिस्ट विचार के अंतर्विरोधों के समानांतर है भारतीय राष्ट्र की विसंगतियाँ। हमारी व्यवस्था ने अपने गाँवों, खासकर आदिवासी इलाकों को तवज्जो नहीं दी। औद्योगिक मजदूरों की क्रांति की जड़ें यहाँ जमी नहीं। ग्रामीण क्रांति के लिए बेहतर हालात हमेशा रहे। देश के 630 में से 180 जिले माओवादियों के शिकंजे में हैं। माओवादी हैं कौन? उनके नेताओं की बात न करें तो वे हाशिए में पड़े लोग हैं।

माओवादी विचार के लिए बेहतरीन परिस्थितियाँ यों भी मौजूद हैं। हमारे प्लानिंग कमीशन के पास ऐसी अनेक रपटें मिल जाएंगी, जिनमें उन इलाकों का अध्ययन किया गया है जो आंदोलनों और बगावतों की चपेट में हैं। बिहार और आंध्र में ग्रामीण असंतोष पर मनमोहन सिंह समिति की रपट भी उनमें एक होगी। सन 2008 में योजना आयोग के एक विशेषज्ञ दल ने विस्तार से बताया कि यह विकास और प्रशासन की गैर-मौजूदगी के कारण उपजी समस्या है।

माओवादी दर्शन जनता को आगे रखकर पीछे से हिंसा की रणनीति के सहारे चल रहा है। हाल के वर्षो में उन्होंने वैश्वीकरण को भी टार्गेट करना शुरू किया है। इस्लामी उग्रवाद को वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई मानते हैं। भारतीय माओवाद का नेपाली पार्टी से कोई रिश्ता स्पष्ट नहीं है। राज-व्यवस्था का कोई साफ मॉडल भी उनके पास नहीं है।

माओवाद की अपनी ज़मीन यानी चीन में आज व्यवस्था फर्क है। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनकी माँग क्या है। मोटे तौर पर वे फौजी कारवाई रुकवाना चाहते हैं। माइनिंग और औद्योगीकरण के लिए ज़मीन के इस्तेमाल और दलितों-आदिवासियों की बेहतरी से जुड़े मसले उनकी बातों में सुनाई पड़ते हैं। उनके पीछे खड़े लोगों के मन में भयावह नाराज़गी है। अपने उपेक्षित रह जाने का अफसोस। उनसे हमदर्दी रखने वालों ने उन्हें बंदूक का रास्ता दिखाया है।

फौजी कारवाई के बाबत सरकारी रुख अटपटा है। कहा जाता है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है वहीं गृहमंत्री कहते हैं कि कोई ऑपरेशन नहीं है। दूसरी ओर पिछली 25 मार्च को रायपुर में छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री मनकीराम कंवर ने कहा कि ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान 90 माओवादी मारे गए हैं और उनके 12 ट्रेनिंग कैम्प तबाह किए गए हैं। या तो राज्य और केन्द्र का इस मामले में समन्वय नहीं है या फिर  कोई संशय है। बहरहाल युद्ध भी छोटे से दौर के लिए हो सकता है। उद्देश्य जनता को सशस्त्र लोगों के दबाव से बाहर लाने का होगा। नक्सली हिंसा के नाम पर जबरन वसूली और लूट भी हो रही है। उसे रोकने की ज़रूरत भी है। 

मोटे तौर पर समस्या राजनैतिक है और कमजोर तबकों के संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित रहने के कारण पैदा हुई है। एक बड़ी विफलता मुख्यधारा की पार्टियों की है। जनता से जोड़ने का काम उनका था। उनकी और सरकारी अमले की अकर्मण्यता ने माओवादियों के लिए स्पेस बनाया। गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और  गवर्नेंस का प्रवेश होता तो हिंसक विचारों को जगह नहीं मिलती।

गाँवों के छोटे मामलों में त्वरित न्याय की ज़रूरत भी होती है। नक्सली व्यवस्था में जन अदालतों के बारे में भी सुनाई पड़ता है। यह राज-व्यवस्था के अनुपस्थित होने का संकेत है। हिंसा और प्रति-हिंसा स्वाभाविक है, पर थोड़े से वक्त के लिए। श्रीलंका को हाल में लम्बे हिंसक दौर से मुक्ति मिली है। पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में हालात खराब हैं। अफगानिस्तान अराजक है। बड़ी फौजी कारवाई पर विचार करने के पहले उपलब्ध विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए। और ज्यादातर विकल्प राजनैतिक हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

pjoshi23@gmail.com

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