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ब्याज दरों को कम रखना अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी

केंद्र सरकार के मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने सरकार को आगाह किया है कि इस समय महंगाई या मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए उठाया गया कोई भी सख्त कदम अर्थव्यवस्था की विकास गति को प्रभावित कर सकता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था में धीमी गति से जो मांग बढ़ती जा रही है, वह बुरी तरह से प्रभावित होगी और देश के विकास का रास्ता बाधित होगा।

पिछली 19 मार्च को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने देश में लगातार बेकाबू होती महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अपनी मौद्रिक नीति को कठोर बना दिया है। निश्चित रूप से रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था के मंदी से बाहर आने के साथ-साथ कठोर मौद्रिक नीति की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। आम बजट से एक महीने पहले ही रिजर्व बैंक ने 29 जनवरी को सीआरआर में पौन फीसदी की बढ़ोतरी कर यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब ब्याज दरों में बढ़ोतरी की भूमिका तैयार हो गई है।

आरबीआई के द्वारा एक ही झटके में बाजार से 36,000 करोड़ रुपए की तरलता सोख ली गई । इसके बाद महंगे कर्ज का दौर शुरू हो गया है। स्थिति यह है कि अब तक जो सार्वजनिक तथा निजी बैंक पिछले तीन सालों से नई माँग निर्माण के लिए नए ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनी विशेष ग्राहक आकर्षण योजनाओं के तहत होम लोन, ऑटो लोन तथा उपभोग लोन के आरंभिक वर्षो में रियायती ब्याज दर (टीजर लोन रेट) ही वसूलते रहे हैं उन बैंकों ने अब रियायती ऋण स्कीमों को भविष्य में जारी न रखने का फैसला किया है।

निजी क्षेत्र के ज्यादातर बैंकों ने तो ब्याज दरें बढ़ाई ही हैं साथ ही भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ इंडिया समेत कई सार्वजनिक बैंकों ने ब्याज दर बढ़ाने का बाकायदा निर्णय ले लिया है।

लेकिन वास्तव में देश के कई क्षेत्रों में अभी महंगे कर्ज के दौर से बचने की जरूरत है। देश के आवास उद्योग, वाहन उद्योग, उपभोक्तावस्तुओं के उद्योग सहित कई उद्योग अभी मंदी के दौर से डगमगाते कदमों से आगे बढ़ रहे हैं। उन्हें सस्ते कर्ज की जरूरत है। खासतौर से आवास ऋणों पर कम ब्याज सबसे ज्यादा जरूरी है। आवास समस्या से जूझ रहे देश के करोड़ों लोगों के लिए आवास ऋण पर ब्याज दर बढ़ने का यह दौर चिंताजनक है।

अब आवास ऋण पर अधिक ब्याज और अधिक किश्तों का भुगतान होने से मकान बनाने की डगर पर लोगों के बढ़ते कदमों पर रोक लग जाएगी। महंगे ब्याज पर ऋण बैंकों की गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) अर्थात बैंकों के डूबे हुए लोन को भी बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं।

ब्याज दर संबंधी ऐसी ही कठिनाई देश के छोटे उद्यमी और छोटे व्यवसायी भी अनुभव कर रहे हैं। जैसे-जैसे मंदी का असर छंट रहा है और आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ रही है, वैसे-वैसे निजी क्षेत्न और छोटे उद्योग-व्यवसाय भी अधिक कर्ज की माँग बैंकों से करने लगे हैं। सिर्फ रिटेल ग्राहक ही नहीं उद्योग जगत भी अपने विस्तार के लिए लोन लेने में आगे हैं। लेकिन छोटे उद्योगों और छोटी कंपनियों को लोन पर अब ज्यादा ब्याज की चिंता बढ़ गई है।

हमें औद्योगिक एवं व्यावसायिक क्षेत्न के कर्ज महंगे करने के पहले इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि इस समय भारत के औद्योगिक और निर्यात प्रतिस्पर्धी देशों में ब्याज दरें कितनी हैं। भारत के मुकाबले प्रतिस्पर्धी एशियाई देशों चीन, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर में प्रचलित ब्याज दरें चार-पाँच फीसदी सस्ती हैं।

सस्ती ब्याज दर से उद्योगों के विकास और वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धा का सामना करने में बहुत सहयोग मिलता है,खासतौर से भारत को इस समय चीन से सबसे ज्यादा व्यापार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चीन कम ब्याज दर और कम श्रम लागत के कारण भारत को बड़ी व्यापार चुनौतियाँ देते हुए दिखाई दे रहा है।
निसंदेह रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रलय को हाल ही में प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह के द्वारा संसद में दिए गए उस वक्तव्य को ध्यान में रखना है कि इस समय देश को कठोर मौद्रिक नीति के द्वारा कर्ज पर ब्याज दर बढ़ाने की नहीं, वरन कठोर राजकोषीय नियंत्नण की जरूरत है।

देश के अधिकांश अर्थ विशेषज्ञ भी यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि यद्यपि देश की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मंदी से बाहर आ रही है, लेकिन मौद्रिक डगर पर लगाम संभलकर ही खींचनी होगी। हम आशा करें कि वित्त मंत्नालय और रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था के जरूरतमंद क्षेत्रों के लिए मौद्रिक नीति को और अधिक कठोर नहीं बनाएँगे और वे ब्याज दरों में अधिक वृद्धि की इजाजत नहीं देंगे।

लेखक अर्थिक मामलों के जानकार हैं

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