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भूख का बिल

विद्वानों की कई राय हैं इसलिए मतभेद हैं। कुछ कहते हैं कि देश में 22 प्रतिशत गरीब हैं, कुछ कहते हैं 37 प्रतिशत हैं, कुछ कहते हैं कि 56 प्रतिशत है, हर आंकड़े पर कोई न कोई विद्वान है। फिर दूसरा सवाल यह है कि क्या सारे के सारे गरीब भूखे हैं, या कुछ खाते पीते गरीब हैं या कुछ ऐसे भी हैं जो गरीब नहीं है पर भूखे हैं।

गरीबों का नाम लेकर राजनीति करने वाले लोगों की हालत यह है कि उन्होंने इतना खा लिया है कि बात करने को मुंह खोलते हैं तो डकार ही आती है। कुछ खा पीकर अब महिलाओं को देखकर सीटी बजाने का व्यायाम कर रहे हैं कुछ यह माने हुए हैं कि उन्होंने जो कुछ खाया वह अपने आप गरीबों के पेट में पहुंच गया, अलग से गरीबों को कुछ खाने की जरूरत नहीं है।

अब गरीबों को रोटी की नहीं, सिर्फ सम्मान की जरूरत है, खाने पीने का काम तो गरीबों की आर से वे खुद कर लेंगे। कुछ लोग बिल से ज्यादा टिप की ओर ललचाए खड़े हैं। एक सवाल यह है कि गरीब को कितना खाना मिलना चाहिए। सामान्य समझ यह है कि किसी को भी भरपेट खाना मिलना चाहिए, बशर्ते वह वजन घटाने के लिए डायटिंग न कर रहा हो।

इस बात पर सभी सहमत हैं कि गरीबों को डायटिंग करने की जरूरत नहीं है, लेकिन कितना खाना मिलना चाहिए इस पर मतभदे है। कुछ का कहना है कि भर पेट खाना मिले कुछ का कहना है कि इतना खाना देना पर्याप्त होगा कि गरीब आज भूख से न मरे, छह महीने तक घिसट घिसट कर मरे। यानी मौत भूख से नहीं, कुपोषण से हो। भूख और अनाज के बीच रिश्ता आसान नहीं है। लेकिन सोनिया गांधी का क्या करें जो खाद्य सुरक्षा बिल के पीछे पड़ी हैं।

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