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बर्दाश्त के बाहर

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षाकर्मियों पर भयावह नक्सली हमले ने केन्द्र और राज्य सरकारों की नक्सल विरोधी रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत पैदा कर दी है। लंबे वक्त से माओवादी सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे हैं और ज्यादातर सुरक्षाकर्मी किसी आमने सामने की मुठभेड़ में नहीं मारे गए, बल्कि माओवादियों के घात लगाकर किए गए हमलों का शिकार हुए हैं, जिनमें उन्हें बचाव या पलटवार का मौका ही नहीं मिला।

यह तो स्पष्ट है कि अब माओवादियों के खिलाफ एक सुनियोजित आक्रामक अभियान चलाया जाना चाहिए, क्योंकि बार-बार अपील करने पर भी वे बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि लगातार ज्यादा घातक हमले कर रहे हैं। वे बातचीत के लिए भी तभी सामने आएंगे जब उन पर सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई का दबाव पड़ेगा और वे अपनी स्थिति कमजोर पाएंगे। यह स्थिति आए इसके लिए पहले उनके खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई तेज करने की जरूरत है।

माओवादी भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके हैं, और इसलिए उनके खिलाफ कई मोर्चो पर युद्ध लड़ने की जरूरत है। सशस्त्र कार्रवाई इस युद्ध का एकमात्र नहीं, सिर्फ एक महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए और उसके लिए भी पूरी तैयारी पहले जरूरी है। सुरक्षा बलों के बार-बार नक्सली घात के शिकार होने का अर्थ है कि वे दुश्मनों की रणनीति से ठीक से वाकिफ नहीं हैं और उसके जवाब में उनके पास सही रणनीति नहीं है।

सिर्फ संख्या बल और हथियारों के सहारे माओवादियों का मुकाबला करने का मतलब दोनों ओर से भारी रक्तपात होगा, जिससे बचा जाना चाहिए। सुरक्षा बलों के जवानों की जानें भी कीमती हैं और उन गरीब आदिवासी, दलितों की भी, जिनके बीच माओवादी घुसपैठ कर चुके हैं। माओवादियों से युद्ध का अर्थ माओवाद प्रभावित इलाके के लोगों को उनसे मुक्त कराना और वे सारे हक देना है, जिनके वे भारतीय नागरिक होने के नाते हकदार हैं।

इस समूचे अभियान में ‘गुरिल्ला युद्ध के जवाब में गुरिल्ला युद्ध’ की रणनीति अपनानी जरूरी है और इसके लिए सुरक्षा बलों के लिए भी इलाके की गहरी जानकारी और स्थानीय जनता का सहयोग पाना भी उतना ही जरूरी है। सरकार ने माओवादियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल की संभावना से इंकार किया है, जो कि सही है लेकिन तमाम राज्यों की सरकारों, केन्द्र सरकार, स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों में अच्छा तालमेल होना चाहिए ताकि माओवादियों पर हर ओर से लगातार दबाव बनाया जा सके।
    
एक बड़ी समस्या यह है कि अलग-अलग राज्य सरकारों का रवैया अलग-अलग है और रणनीति भी अलग-अलग है इसलिए अक्सर यह होता है कि एक राज्य में वारदात करके माओवादी दूसरे राज्य में भाग जाते हैं। राज्य सरकारों को इस समस्या से निपटने के लिए राजनैतिक मतभेद भुलाने होंगे और अपनी ताकत को एकजुट करना होगा साथ ही माओवादियों से मुक्त हुए इलाकों में तेजी से विकास कार्यक्रम चलाने होंगे।

सुरक्षा बलों की ट्रेनिंग का एक हिस्सा यह भी होना चाहिए कि किस तरह आम लोग उन्हें आक्रांता की तरह नहीं, मित्र की तरह देखें और उन पर भरोसा करें। इस खूनी खेल में अब तक बहुत लोग मारे गए हैं, अब वक्त आ गया है कि अपना पूरा जोर लगाकर इसे खत्म किया जाए।

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