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नक्सली बर्बरता पर खौले बुजुर्ग योद्धा

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने पैरा मिलिट्री फोर्स के सिर्फ 76 जवानों की ही जान नहीं ली, बल्कि इतने परिवारों की तीन पीढ़ियों की खुशहाली निकल ली है। बर्बर हमले में गाजियाबाद ने भी तीन बेटों को खोया है। खूनी माओवादियों की क्रूरता पर उन बुजुर्ग योद्धाओं के खून भी खौल उठे हैं, जिन्होंने अतीत में न जाने कितने युद्ध और कितनी ही गुरिल्ला जंग लड़ीं।
चार पीढ़ियों से सेना और सरहद की निगहबानी करते आ रहे रिटायर्ड कर्नल ओमकार सिंह गुस्से में हैं। दुखी मन से कहते हैं कि एक जवान की जान जाने का मतलब होता है, तीन पीढ़ियां तबाह हो जाना। नक्सलियों के खिलाफ जंग ऐसे नहीं जीती जा सकती। अब यह काम सेना के हाथों में दे दिया जाना चाहिए, वरना पैरा मिलिट्री फोर्स यूं ही अपने जवानों को खोती रहेगी और सरकार कुछ नहीं कर पाएगी।
कर्नल सिंह चालीस साल सेना में रहे हैं। पिता मुंशी सिंह आजादी से पहले सैनिक थे। बेटे अजीत सिंह बतौर लेफ्टीनेंट कर्नल कारगिल की जंग लड़ चुके हैं और उस दौरान बम के हमले में गंभीर घायल हुए थे। अभी अजीत सिंह के पुत्र परमतप सेना में सैकेंड लेफ्टीनेंट हैं। इंडो-चाइना वार, भारत-पाक युद्ध के साथ कितने ही गुरिल्ला ऑपरेशन में भाग ले चुके कर्नल ओमकार कहते हैं कि नक्सलियों से उनके गढ़ बन चुके जंगल में जाकर लड़ने के लिए उसी तरह का होमवर्क जरूरी है।
खामी रणनीति बनाने में हो रही है। जवानों को छोटे असलाहों के बजाए लंबी और भारी बजन की राइफलें लेकर जंगलों में भेजा जा रहा है, जहां अचानक हमले के वक्त उनको पोजीशन लेने में दिक्कत हो रही है। कर्नल सिंह बेबाकी से कहते हैं कि गुरिल्ला लड़ाई में जीतता वही  है जो पहले हमला करता है। सरकार बचाव की मुद्रा अपनाने के बजाए सेना को नक्सलियों के खिलाफ मोर्चे पर तुरंत सेना को लगाए, वरना ऐसे नुकसान होते रहेंगे।
जिला सैनिक कल्याण अधिकारी रिटा. ले कर्नल पुष्पाधरन भी नक्सलियों की बर्बरता पर गुस्से में दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि सरकार को नक्सलियों के खिलाफ और कड़े तेवर अपनाने चाहिए।

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