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तमिल उलझन

आम चुनाव की आहट के साथ जब कोई राष्ट्रीय मुद्दा नदारद हो तो राजनीतिक पार्टियां क्षेत्रीय स्तर पर कोई न कोई मुद्दा खड़ा कर देती हैं। यह प्रयास केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक और राजस्थान में अपने-अपने ढंग से चल रहा है, पर इन में सबसे ज्यादा गंभीर श्रीलंका में सैन्य कार्रवाई का मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति को बैठे-बिठाए मिल गया है। लोकसभा में विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के एलटीटीई विरोधी बयान के खिलाफ तमिलनाडु के सांसदों का हंगामा इसी राजनीति का हिस्सा है। तमिलनाडु के राजनीतिक दल श्रीलंका के तमिल मुद्दे को छोड़ भी नहीं सकते और भारत सरकार ने जो रुख अपनाया है, उसे देखते हुए वे कुछ कर भी नहीं सकते। इसलिए वे भारत सरकार पर दबाव बनाते हुए दिखना चाहते हैं ताकि इस चुनाव में उन्हें अपने इलाके में तमिल मुद्दे को छोड़ देने की नाराजगी न झेलनी पड़ी। इस मामले में सबसे बुरी स्थिति द्रमुक और पीएमके की हो रही है, क्योंकि यूपीए का हिस्सा होने के नाते उनसे केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की जो अपेक्षा थी, उसे वे पूरी नहीं कर पा रहे हैं। इसी कमी को पीएमके श्रीलंका पर ‘तमिलों के नरसंहार’ का आरोप लगा कर तो एमडीएमके वहां हथियारों की सप्लाई रोकने की मांग कर पूरी कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर होने वाले आत्मदाह भी इसी तमिल राजनीति का हिस्सा हैं। इस तरह के उग्र आयोजनों में भारतीय जनता पार्टी भी काफी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही है। हालांकि वह उस अन्नाद्रमुक से तालमेल करने के प्रयास में भी है जो एलटीटीई पर सैनिक कार्रवाई को बिलकुल सही मानती है। तमिलों के इस गुस्से का इजहार वहां के ‘नक्कीरन’ जसे अखबार श्रीलंकाई राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे के गले में नरमुंडों की माला पहना कर और वहां ‘भाड़ में जाएं राजपक्षे’ जसा बैनर शीर्षक लगा कर भी कर रहे हैं, जिस पर श्रीलंका के उप उच्चायुक्त ने कड़ी आपत्ति जताई है। जाहिर है जब तक श्रीलंका सरकार अपनी बाकी बची ‘पांच प्रतिशत’ कठिन सैन्य कार्रवाई पूरी नहीं कर देती और हमार आमचुनाव नहीं हो जाते, तब तक एक तरफ कनिमोझी के बहाने जयललिता करुणानिधि पर परिवारवाद का आरोप तेज करंगी, तो करुणानिधि अपने जन्मदिन पर हवन जसे ब्राह्मणवादी अनुष्ठानों को अपनाएंगे। वहीं दूसरी तरफ श्रीलंका में मार जा रहे तमिलों की आत्मा की शांति के लिए राजनीतिक अनुष्ठान होते रहेंगे।

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  • Web Title: तमिल उलझन