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तालमेल की कमी का खामियाजा

छत्तीसगढ़ की नक्सलवादी हिंसा में भारी संख्या में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की जान जाना यह बताता है कि वहां कई चीजें गड़बड़ चल रही हैं। पहली और सबसे बड़ी समस्या यह है कि राज्य पुलिस बल और सीआरपीएफ में तालमेल की भारी कमी है।

वहां जब भी बातचीत की जाती है तो स्थानीय पुलिस अधिकारी सीआरपीएफ की शिकायत करते हैं और सीआरपीएफ के अधिकारी स्थानीय पुलिस की शिकायत करते हैं, जबकि नक्सलवादियों के खिलाफ चलने वाले ऑपरेशन ऐसे होते हैं जिनकी सफलता बहुत हद तक इन दोनों बलों के तालमेल पर ही निर्भर करती है। अभी तक इस घटना की जितनी जानकारी आई है उससे यही लगता है कि तालमेल की कमी भी इस घटना की एक वजह हो सकती है।

खबरों में यह कहा जा रहा है कि एक हजार नक्सलवादियों ने हमला बोल दिया। अब इतनी भारी संख्या में नक्सलवादी कहीं आसमान से तो नहीं टपके होंगे। वे कहीं इकट्ठा हुए होंगे। उन्होंने इसके लिए बाकायदा तैयारी की होगी। फिर वे मिलकर हमले के लिए चले होंगे। निश्चित रूप से इसकी जानकारी स्थानीय गांव वालों को रही होगी। जिस रास्ते से वे गुजरे होंगे वहां लोगों ने उन्हें जमा होते, आते जाते देखा होगा। इन गांवों में अगर आपका खुफिया नेटवर्क है तो जानकारी आनी ही चाहिए थी। या तो फिर कारण यह है कि इंटेलीजेंस नेटवर्क एक सिरे से ही गायब है।

गलती दो में से किसी एक जगह तो है ही। या तो जानकारी आई और वह सीआरपीएफ तक पहुंची ही नहीं और नहीं आई तो यह तो एक और भी ज्यादा गंभीर बात है। कुछ लोग इसे घटना को एक दिन पहले पश्चिम बंगाल में दिए गए केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बयान से जोड़ कर देख रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि यह हिंसा उस बयान की प्रतिक्रिया में हुई है। महज एक ही दिन में इतना बड़ा हमला कर देना संभव नहीं है। इसके लिए लंबी तैयारी की जरूरत पड़ी होगी। यह काम रातोंरात नहीं हो सकता। चिदंबरम के बयान और इस हमले का एक के बाद एक हो जाना महज एक संयोग भी हो सकता है, हालांकि मीडिया में इसे जोड़कर ही देखा जाएगा।

इस घटना का एक बड़ा कारण गलत रास्ते का चुनाव भी है। ऐसे मौकों पर सुरक्षा बलों से यह कहा जाता है कि वे पिटे-पिटाए रास्ते पर न चलें। बल्कि कुछ इलाकों के बारे में तो यह तक कहा जाता है कि वहां सुरक्षा बल पैदल चलें, गाड़ी में बैठकर न जाएं। गाड़ी को निशाना बनाना आसान होता है, साथ ही अगर गाड़ी निशाना बन जाए तो एक साथ बड़ी संख्या में जवानों की जान चली जाती है।

जिन इलाकों में बारूदी सुरंगों के बिछे होने के आशंका होती है उनमें तो यह खतरा और भी ज्यादा होता है। ऐसे इलाकों में अगर पैदल जाया जाए तो बारूदी सुरंग के फटने की स्थिति में एक या दो जवानों की ही जान जाएगी, कम से कम मरने वालों जवानों की संख्या दर्जनों में तो नहीं ही होगी।

कई बार वहां तैनात लोगों को लगता है कि सड़क बनी ही है तो पैदल क्यों जाया जाए, गाड़ी से जाना ही ठीक रहेगा। सारा खतरा इसी रास्ते से आता है। जंगली क्षेत्रों में तो हमेशा ही ऐसे रास्तों से जाना चाहिए, जहां से आपके आने की उम्मीद किसी को भी न हो। नक्सलवादियों को भी नहीं। इसके विपरीत अगर आप ऐसे रास्ते से वहां पहुंचते हैं जहां से आपके गुजरने की बात हर कोई सोच सकता हो तो इसका अर्थ है कि आप आक्रमण को निमंत्रण दे रहे हैं।

यह ठीक है कि देश भर में नक्सलवादियों के खिलाफ जो अभियान चल रहा है उसमें अभी आंशिक सफलता ही मिली है, लेकिन सफलता इतनी जल्दी मिलती भी नहीं है। उसमें समय लगता है। सुरक्षा जवान जब बाहर से कहीं पहुंचते हैं तो उन्हें वहां जमने में काफी समय लगता है। एक तो उन्हें स्थानीय जमीन और भूगोल को समझना होता है। वहां पहुंचकर कैंप स्थापित करने और भोजन पानी की व्यवस्था करने में ही काफी समय लग जाता है। साथ ही उन्हें अपनी खुद की सुरक्षा का भी इंतजाम करना होता है।

एक और भी जरूरी चीज होती है स्थानीय आबादी में अपना आधार बनाना, ताकि उनके आस पास जो घट रहा है उसकी खबरें उन तक भी पहुंचें। इन सब कामों में कई बार ज्यादा वक्त भी लग जाता है। उसके बाद ही उनका ऑपरेशन किसी रास्ते पर चल पाता है। इससे हमें रातोंरात किसी बड़ी कामयाबी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

नक्सलवादियों के खिलाफ चल रही इस कार्रवाई पर देश भर में इस समय एक निर्थक बहस चल रही है। वह यह कि इस अभियान का नाम ऑपरेशन ग्रीन हंट है या नहीं। सरकार यह कह रही है कि यह नाम तो मीडिया ने दिया है। यह बात कुछ हद तक सच भी है। शुरू में छत्तीसगढ़ में जो कार्रवाई हुई उसे ऑपरेशन ग्रीन हंट कहा गया था, लेकिन अब इस शब्द का इस्तेमाल देश भर में हो रही नक्सलवादी विरोधी कार्रवाई के लिए किया जा रहा है। फिलहाल इस अभियान का नाम कोई मुद्दा नहीं है। असल बात यह है कि नक्सलवादियों के खिलाफ देश भर में एक अंतरराज्यीय सशस्त्र कार्रवाई चल रही है। इसे आप जो भी नाम दें लेकिन कार्रवाई चल रही है यह एक हकीकत है और इसकी जरूरत भी है।

इस अभियान को अब और भी सघन बनाने की जरूरत है, लेकिन यह काम पूरी होशियारी से करना होगा। अभी तक जो हुआ है उससे सीख लेनी होगी। स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बल में तालमेल बिठाना इसकी सफलता की पहली शर्त है। साथ ही इस अभियान में लगे जवानों को अपनी खुद की सुरक्षा के प्रति सचेत होना होगा। थोड़ी सी भी चूक जवानों और ऑपरेशन दोनों के लिए ही घातक हो सकती है।

लेखक बीएसएफ के पूर्व डीजीपी हैं

प्रस्तुति- हरजिंदर

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