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भूख के खिलाफ

सत्तर के दशक में शायर दुष्यंत कुमार ने लिखा था कि ‘भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ, आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दुआ’। यह स्थिति अब फिर बन गई है। एक तरफ स्वाधीनता संग्राम के केंद्र, भारत के पहले प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र और देश की प्रमुख बौद्धिक पीठ के रूप में चर्चित इलाहाबाद से भूखे बच्चों के मिट्टी खाने की खबरें आ रही हैं तो दूसरी तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा कानून तैयार करने के लिए माथापच्ची कर रही है।

देश के आदिवासी अंचलों से जो हिंसा और उग्रवाद की खबरें आ रही हैं उनके पीछे भी भूख एक कारण है। इन स्थितियों में यूपीए सरकार के चुनावी वादे के मुताबिक खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाना बेहद जरूरी हो गया है, लेकिन अधिनियम इस प्रकार का होना चाहिए कि उससे देश कीआवाम को भूख से मुक्ति मिले। इस मसले पर जिस तरह का विमर्श पिछले एक साल से नागरिक समाज ने चलाया है उससे हमारी सरकार ज्यादा सहमत नहीं दिखती। अगर सहमत होती तो कानून अब तक बन गया होता।

लेकिन कानून आने में देरी से बन रही निराशा के बीच सोनिया गांधी सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरी हैं। राष्ट्रीय सलाहकार समिति के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने सरकार पर इस कानून के दायरे को व्यापक करने का दबाव बना रखा है। एक तरह से वे सरकार के सामने नागरिक संगठनों की ही बातें रख रही हैं।

यही वजह है कि खाद्य और कृषि मंत्रालय के अनुदार रवैये के बावजूद मंत्रियों का विशिष्ट समूह महज 22.7 प्रतिशत आबादी को गरीब मानकर कार्यक्रम नहीं बना पा रहा है। इस कानून के साथ दो प्रमुख मसले फंसे हुए हैं। एक मामला यह है कि देश में कितने गरीब हैं और दूसरा यह कि उनकी भूख कितनी है या कितने किलो अनाज उनकी भूख शांत करने के लिए पर्याप्त होगा।

नागरिक समाज के संगठनों का कहना है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या को लेकर भारी भ्रम की स्थिति है। इसकी वजह यह है कि गरीबी का आकलन कभी परिवार की आय या क्रयशक्ति के लिहाज से किया जाता है तो कभी कैलोरी के उपभोग के आधार पर। स्वयं सरकार के विभिन्न आयोग और समितियां इसे 27.5 प्रतिशत से लेकर 50 और सत्तर प्रतिशत तक रखती रही हैं। ग्रामीण विकास मंत्रलय की तरफ से नियुक्त एनसी सक्सेना समिति के अनुसार, देश में 50 प्रतिशत गरीब हैं।

अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर गरीबों की संख्या 37.5 प्रतिशत बताते हैं, जबकि राज्य सरकारों के आकलन के अनुसार यह संख्या 45 प्रतिशत है। गरीबों की संख्या के अलावा दूसरा विवाद उपायों पर है। कहा जा रहा है कि अगर सही मायने में किसी को भूखा नहीं रहने देना है तो तीन रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से 25 किलो चावल या गेहूं देने से काम नहीं चलेगा। इसे कम से कम 35 किलो करना होगा और इसमें बुजुर्ग, विकलांग और अकेली महिला को शामिल करना होगा।

इसके तहत अनाज की गुणवत्ता भी सुनिश्चित करनी होगी और कार्यक्रम को लागू करने के लिए राज्य के स्तर पर खाद्य आयुक्त भी नियुक्त किए जाने चाहिए। जाहिर है कि कानून का दायरा जितना व्यापक होगा उसका बजट भी उतना ही बड़ा होगा। इस चुनौती के बावजूद अपने नागरिकों पर समय रहते किया जाने वाला यह व्यय आखिरकार देश को सुख और समृद्धि के रास्ते पर ही ले जाएगा।

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