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क्योंकि ये जवान हमारे हीरो हैं

शिकागो के बाहरी इलाके में रहते हुए डेनेट ओरेगॉन का सपना एक पेंटर बनने का था। तभी 2001 में 11 सितंबर का हमला हो गया। पेंटिंग उसका पहला प्यार था। लेकिन उसने देश के लिए सेना में भर्ती होने का फैसला किया। शुरुआती दौर में सेना ने उसे बहुत मजा दिया। लेकिन 2005 में अफगानिस्तान में लड़ते हुए वह घायल हो गया। उसके दोनों पैर उस हादसे में चले गए। इराक और अफगानिस्तान की लड़ाई में अपने तकरीबन एक हजार जवानों ने शरीर का कुछ न कुछ गंवाया है। अब उन्हीं घावों के साथ जीने को वे अभिशप्त हैं। इन लोगों ने देश के लिए अपना हाथ-पैर वगैरह गंवाया है। लेकिन उन्हें जो सम्मान सरकार और देश से मिलना चाहिए, वह मिल नहीं पा रहा है। उन्होंने जो कुर्बानी दी है, उसे भी मानने को लोग तैयार नहीं हैं। इन जवानों को खास दर्जा देना चाहिए। उन्हें वह हर चीज मिलनी चाहिए, जिसका ये सपना देखते थे। आखिरकार वे हमारे हीरो हैं। हम उन्हें बीच में नहीं छोड़ सकते।
इंटरनेशनल हेरल्ड ट्रिब्यून

जेल और सुधार
फिजी के जेल और सुधार विभाग ने कैदियों की जिंदगी सुधारने के लिए एक कार्यक्रम चलाया है। उसमें कैदियों को आनेवाली जिंदगी में बेहतर नागरिक बनाने का सपना देखा गया है। फिजी की जेलों में करीब 65 फीसदी सजायाफ्ता तीस साल से कम उम्र के हैं। उनके आगे पूरी जिंदगी पड़ी हुई है। उन्हें वापस समाज में जाना है। जब वे समाज में लौटें, तो बदली हुई शख्सियत हों। एक अभियान उन खास समुदायों के लिए चलाया गया है, जो जेल जाना फख्र की बात समझते हैं। उन्हें मनोविज्ञानी और समाजशास्त्रियों  के जरिए बताने की कोशिश हो रही है कि जेल कोई मौजमस्ती की जगह नहीं है, वह कुल मिला कर सुधार करने के लिए है।
फिजी टाइम्स

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