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खराब-खुफिया तंत्र और रणनीति के कारण अर्धसैनिक बल बने शिकार

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि असफल रणनीति, खराब खुफिया तंत्र और आत्मसंतोष के घातक संयोजन ने केंद्रीय अर्धसैनिक बल के जवानों को छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित वनों में आसान निशाना बना दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार के पूर्व सुरक्षा सलाहकार केपीएस गिल ने कहा कि नक्सल विरोधी रणनीति असफल रणनीति है। यह पूरी तरह असफल है। किसी ने किसी किताब से इस रणनीति को ले लिया है और इसे अर्धसैनिक बलों पर थोप दिया है, जो बहुत आज्ञाकारी सेवक हैं और जो उनसे कहा जाता है, उस पर कभी आपत्ति नहीं उठाते।

गिल ने प्रश्न उठाया कि ग्रीन हंट ऑपरेशन में किसका शिकार हो रहा है।

उन्होंने कहा आप उस जंगल में 100 लोगों को भेज रहे हैं, जिनमें से एक को भी उस इलाके के बारे में अच्छे से जानकारी नहीं है। चार दिन बाद वे आसान निशाना बन रहे हैं।

पंजाब से आतंकवाद का सफाया करने वाले के तौर पर पहचाने जाने वाले गिल ने बारूदी सुरंग विस्फोट निरोधी वाहनों की भी आलोचना करते हुए उन्हें मौत का फंदा बताया।

गिल ने कहा कि अगर कोई बारूदी सुरंग विस्फोट होता है तो इस वाहन में बैठा हर व्यक्ति मारा जाएगा, या तो विस्फोट के कारण या फिर वाहन में से निकलने के बाद हमले के कारण।

सीमा सुरक्षा बल के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह का मानना है कि सीआरपीएफ और प्रदेश पुलिस के बीच खुफिया जानकारी की भागीदारी का स्पष्ट अभाव और आत्मसंतुष्टि की भावना है।

सिंह ने कहा कि सीआरपीएफ और पुलिस दोनों ही कुछ स्तर तक आत्मसंतुष्ट रहे। नहीं तो, इतने बड़े स्तर पर हमला सामान्यत: तब तक नहीं होता जब तक आप बहुत ही ज्यादा लापरवाह और स्वयं को लेकर आत्मसंतुष्ट न हों। ऐसे इलाकों में अभियान के दौरान जो सावधानियां बरतनीं चाहिए, आपने वह भी नहीं बरतीं।

सिंह ने कहा कि अगर सीआरपीएफ पर दोनों ओर से हमला हुआ, अगर आईईडी विस्फोट हुए तो निश्चित तौर पर खुफिया भागीदारी की कमी थी और प्रदेश पुलिस इस जिम्मेदारी से नहीं भाग सकती।

सिंह ने सीआरपीएफ पर आरोप लगाया कि उसने जवानों की संख्या बढ़ाई है, लेकिन उनके उपकरणों, प्रशिक्षण और अनुशासन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।

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  • Web Title:खराब खुफिया तंत्र और रणनीति के शिकार बने सुरक्षा बल