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कब तक हमारे पाप धोएगी गंगा

आदिकाल से बहती चली आ रही हमारी पापविमोचिनी गंगा इन दिनों चर्चा में है। हर जगह कहा जा रहा है- ‘ग्लोबल वॉर्मिग प्रारंभ हो चुकी है, क्या सूख जाएगी गंगा? या हिमालय में सुरंगों में डाला जा रहा है गंगा को, क्या होगा मैदानी क्षेत्रों का?’

भारत के अतिरिक्त नेपाल, तिब्बत व बांग्लादेश में फैली गंगा द्रोणी का कुल क्षेत्रफल है 1,060,000 वर्ग किलोमीटर तथा मात्र मैदानी क्षेत्र में ही यह भारत के कुल क्षेत्रफल के 26.2 प्रतिशत भाग में फैला हुआ है। लगभग दो करोड़ वर्ष पूर्व जब चलायमान भारतीय प्लेट, एशियाई प्लेट से जा टकराई, तब प्रारंभ हुआ हिमालय का उठना। पर्वतों के उठने से बने नित नए ढलानों पर नदियों ने मैदानी क्षेत्रों की ओर बहना प्रारंभ किया। महाद्वीपों की वह टक्कर अभी भी जारी है तथा बहुत हद तक अभी भी गंगा या उसकी सहायक नदियों द्वारा बहा कर लाए जा रहे गाद की मात्र इस विवर्तिनिकी पर निर्भर करती है। आदिकाल से नदी के साथ पर्वतों से लाई जा रही रेत की परतें बाढ़ के दौरान फैलती गईं तथा इस प्रकार परत दर परत जमा हुई मिट्टी पर बना-बसा विश्व का सबसे बड़ा जलोढ़ (एल्युवियम) का मैदान।

अपने उद्गम गंगोत्री से भागीरथी रूप में प्रारंभ हुई यह शक्तिशाली नदी देवप्रयाग में अलकनंदा से संगम के बाद ही गंगा के रूप में पहचानी जाती है। भागीरथी और अलकनंदा दोनों की अपनी वृहद द्रोणियां हैं। लगभग 300 किलोमीटर तक नटखट बालिका की भांति अठखेलियां खेलती गंगा तीर्थनगरी हरिद्वार पहुंचती है। उसके बाद 410 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के कन्नौज से रामगंगा प्रथम बड़ी नदी मैदानी क्षेत्र में गंगा से आ मिलती है। इस बीच कोई बड़ी नदी गंगा से नहीं मिलती। प्रयाग में गंगा और यमुना के संगम के बाद गंगा में औसतन 130 बिलियन क्यूबिक मीटर जल प्रवाह होने लगता है।

गंगा का डिस्चार्ज भी विचित्र है, बरसात में अनेक गुना बढ़ जाता है, पर वर्ष के शेष महीनों में क्षीण हो जाता है तथा डिस्चार्ज नित्य बदलता रहता है। जब अचानक डिस्चार्ज घट जाता है तो प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है। गंगा की एक विचित्र फितरत है- मैदानी क्षेत्र में यह किसी स्थान पर तो भूजल से जल लेती है और किसी दूसरे स्थान पर भूजल भंडार में अपना जल देती है। दुर्भाग्य से जिस स्थान पर नदी अपना जल भूजल को दे रही हो उस स्थान पर यदि डिस्चार्ज घट जाए तो प्रदूषण से किनारे बसी आबादी का प्रभावित होना स्वाभाविक है। विशेषज्ञ कहते हैं कि वाराणसी के मालविया पुल के बाद इसमें मौजूद मल के बैक्टीरिया की संख्या घट कर 81714 एमपीएन/100 मिली (2007) हो गई है। हो सकता है यह बात सही हो, पर फिर भी केवल नहाने के लिए भी मानक अनुसार इनकी संख्या 500 एमपीएन/100 मिली से अधिक नहीं होनी चाहिए।

उत्तराखंड में ऋषिकेश से पश्चिमी बंगाल के उलुबेरिया के बीच 16 स्थानों पर लिए गए गंगा जल के नमूनों ने यह तो सिद्ध किया है कि गंगा जल की क्वालिटी गंगा एक्शन प्लान एक के बाद से सुधरी है। पर 1986 से 2008 के मध्य इन स्थानों से लिए गए गंगा जल के नमूने मल बैक्टीरिया के बारे में कुछ और ही कहानी कहते हैं- हरिद्वार में इनकी संख्या 2002-2003 में 400एमपीएन/100 मिली थी जो कि 2008 में बढ़ कर 1600 हो चुकी थी। इसी प्रकार प्रयाग में संगम के बाद मल बैक्टीरिया 2002-2003 में 1807 एमपीएन/100मिली थे जो कि 2008 में बढ़कर 17000 हो चुके थे। उलुबेरिया पहुंचने तक तो 2008 में गंगा की धारा 500000 एमपीएन/100 मिली मल बैक्टीरिया के साथ जल के बजाय मल धारा हो चुकी थी। सवाल आंकड़ों का नहीं है, सवाल तो है कौन है गंगा की इस बुरी दशा का जिम्मेदार? यदि हम नदी के किनारों को शौचालय न समझ पवित्र स्थान समझों, सरकार नगरीय अवशिष्ट ले जा रहे नालों के जल की समुचित सफाई करे, अनुशासन तोड़ने वालों को दंड दे तो इतनी हायतौबा ही न मचे।

गंगा 1914 से 1965 के बीच कई किलोमीटर तक अपनी धारा बदल चुकी है। नदी के किनारे कोई भी विकास प्रारंभ करने के पूर्व आवश्यकता है नदी की हर फितरत को जानने की। गंगा के किनारे 700 छोटे-बड़े नगर हैं- जिनमें से 62 की आबादी एक लाख से अधिक है। किसी भी नगर में नगरीय अवशिष्ट के निष्कासन-प्रबंधन की कोई सुनियोजित नीति नहीं लागू है। नीति तो सरकार ही बना कर लागू कर सकती है, पर यदि हम गंगा मां को माता समान पूज्य स्थान देना चाहते हैं तो किस लिए ‘मैला कर दरिया में डाल’ की नीति अपनाए हुए हैं?
वी. के. जोशी
लेखक भूवैज्ञानिक हैं

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