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उचित दूरी की उलझन

ऊबड़-खाबड़ भारतीय सड़कों पर हवाई यात्रा का लुत्फ़ उठाते बीहड़ किस्म के अखिल भारतीय ट्रक सर्वत्र देखे जा सकते हैं। इन ट्रकों के पीछे तमाम सुभाषित लिखे होते हैं, जिनमें बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला, हॉर्न प्लीज़ या फिर ऐसी ही उच्च कोटि के साहित्य के साथ ही एक जुमला पढ़ने को मिलता है: कृपया उचित दूरी बनाए रखें। इसमें कृपया के हिज्जे गलत लिखने में समूचे देश के पेंटर्स का योगदान एक समान पाया जाता है। यह उचित दूरी वाली सूक्ति ट्रकों के आगे वाले हिस्सों पर कभी नहीं लिखी जाती। इसी वजह से सामने से आने वाले वाहन अक्सर इन ट्रकों से भरत मिलाप कर लेते हैं।

ट्रक को दबंग किस्म का वाहन माना जाता है। दबंग को हमेशा पीछे से खतरा रहता है। क्या पता, कब कौन पीठ पीछे छुरा घोंप दे? मैं जब कभी साइकिल या स्कूटर से निकलता हूं, हमेशा इस बात का खयाल रखता हूं कि रोड पर अपने से आगे गुजर रहे ट्रक के पीछे चलूं। ट्रक के आगे चलने पर खुद के गुजर जाने का डर रहता है। ट्रक के पीछे चलने का एक लाभ यह भी होता है कि ‘कृपया उचित दूरी बनाए रखें’ की इबारत बराबर निगाहों में रहती है। दुर्घटना का खतरा मिनिमाइज होता है।

एक प्रश्न मन में घुमड़ता रहता है। जितनी रखकर मैं चल रहा हूं, क्या वह उचित दूरी है? कितनी डिस्टेंस को उचित माना जाए! क्या उतनी, जितनी भारतीय राजनीति और सदाचार में है या अमेरिका और लादेन में। इसका पैमाना क्या है? हम भी तो बाहर-बाहर दिखाने के लिए उचित दूरी बनाए रखते हैं, अंदर से मिले रहते हैं। पुलिस-अपराधी, नेता-माफिया। ठीक उसी तरह ट्रक ड्राइवर और यातायात सिपाही की मुट्ठियां भी बीच सड़क पर गुपचुप मिलन करती हुई देखी जा सकती हैं। मैं ट्रक के पीछे लगा ऐसी ही बातें सोचता हूं।

 

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