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क्योंकि अंधेरा है

उस बच्चों ने अपना बैग लिया और खेलने के लिए जाने लगा। अंदर से मां निकल कर आई और बोलीं, ‘अंधेरा होते ही घर आ जाना। अगर देर हो जाए तो संभल कर आना।’ आखिर अंधेरे से हमें इतना डर क्यों लगता है? ‘साइकोलॉजिकल साइंस’ के मार्च, 2010 के अंक में एक पेपर छपा है। उसे चेन बो झोंग, वेनिसा बोन्स और फ्रांसेस्का जिनो ने मिल कर लिखा है। इन तीनों साइकोलॉजिस्ट का मानना है कि अंधेरे में आदमी का व्यवहार बदल जाता है। वह कहीं ज्यादा स्वार्थी हो जाता है।
एक अध्ययन में दस-दस लोगों को अलग-अलग रखा गया। उन्हें एक खेल खेलना था। उसमें हारने वाले को पैसा भी देना था। एक ग्रुप को अंधेरे में रखा गया। दूसरा ग्रुप उजाले में था। बाद में पाया गया कि अंधेरे में खेले ग्रुप में बेईमानी ज्यादा हुई थी। उजाले में लोगों ने कम बेईमानी की थी। उसकी क्या वजह है? तीनों साइकोलॉजिस्ट मानते हैं कि उसकी सबसे बड़ी वजह अंधेरा ही है। उस अंधेरे में पहचान छिपाई जा सकती है। लोगों को लगता है कि वे पहचाने नहीं जाएंगे। सो, गड़बड़ी करने में क्या जाता है? सारी दिक्कत ही पहचान की है। इसीलिए दिनदहाड़े गड़बड़ियां कम ही होती हैं।

तमसो मा ज्योतिर्गमय अपने यहां सरकारी सा वाक्य हो गया है। लेकिन वह मनुष्य की इच्छा है। वह अंधेरे से उजाले की ओर जाना चाहता है। वह अंधकार से प्रकाश की यात्रा करना चाहता है। हमारे भीतर एक अंधेरा है। उस अंधेरे को हटाए बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। बाहर के अंधेरे को चीरे बगैर हम सिर्फ भटक सकते हैं। अंधेरा हमें भटकाता है। उजाला हमें राह दिखाता है। गौतम बुद्ध ने कहा था, ‘अप्प दीपो भव’ यानी अपने दीपक आप बनो। अगर कहीं से कोई दिया दिखाने वाला न हो, तो परेशान मत हो। दिया जलाना जरूरी है। अंधेरा मिटाना जरूरी है।

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  • Web Title:क्योंकि अंधेरा है