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चिदंबरम की मुस्तैदी

पी चिदंबरम को आमतौर पर कुशल और सख्त प्रशासक के तौर पर जाना जाता है लेकिन बतौर गृहमंत्री वे अपने समर्थकों और विरोधियों की अपेक्षाओं और आशंकाओं के परे जाकर काम करते रहे हैं। पश्चिम बंगाल के माओवाद प्रभावित लालगढ़ के दौरे में उन्होंने ऐसा ही किया। वहां आम लोगों से मिलकर उन्होंने जहां माओवाद के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर नक्सलवादियों से फिर बातचीत की अपील की। लालगढ़ जाकर और लोगों से घुल-मिलकर उन्होंने यह संदेश दिया है कि आम ग्रामीणों में विश्वास और समर्थन पाने के लिए प्रशासन का सीधे जनता से संपर्क और संवाद जरूरी है। पश्चिम बंगाल सरकार की बड़ी समस्या यह है कि वह माओवादियों के साथ संघर्ष को सिर्फ माओवादियों और वाम मोर्चा के बीच संघर्ष की तरह देखती है। उसकी दृष्टि में आम जनता कहीं नहीं है जिसके प्रति उनकी सचमुच जवाबदेही है।

लालगढ़ में इतनी उथल-पुथल के बावजूद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने लालगढ़ का दौरा नहीं किया, न ही वहां की जनता या प्रशासन से सीधे जुड़ने की कोई सक्रिय पहल की। चिदंबरम ने यह भी रेखांकित किया कि जनता की दिक्कतों को हल करना और माओवादियों से लड़ना दो अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं बल्कि प्रशासन के चुस्त दुरुस्त होने के ही दो पहलू हैं। जाहिर है अगर लालगढ़ में प्रशासन चुस्त-दुरुस्त होता तो लोगों को बिजली, पानी, राशन की रोजमर्रा की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता और वे माओवादियों से प्रभावित नहीं होते, अगर माओवादी जनता के बीच पैठ बनाने की कोशिश करते भी तो पुलिसवाले उनसे लड़ने में सक्षम होते, न कि थाने पर ताला लगाकर भाग खड़े होते जैसे कि उन्होंने लालगढ़ में किया। कई उदारवादी बौद्धिक इलाकों में चिदंबरम के गृहमंत्री होते ही यह आशंका व्याप्त हो गई थी कि नक्सलवादियों के खिलाफ सख्त दमनकारी कार्रवाई की जाएगी। कुछ लोगों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया था कि माओवादियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल होने ही वाला है। चिदंबरम ने लगातार इस आशंका को झुठलाया है। वे माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई पर जोर तो दे रहे हैं लेकिन स्थानीय पुलिस और प्रशासन और कुछ हद तक अर्धसैनिक बलों के सहारे। इसके साथ ही वे लगातार माओवादियों से बातचीत की अपील भी करते आ रहे हैं। दरअसल लगातार उनकी अपील पर ध्यान नहीं देकर माओवादी उदार इलाकों में अपने प्रति सहानुभूति भी खोते जा रहे हैं।

एक तरफ प्रशासन को संवेदनशील और कुशल बनाने की कोशिश और दूसरी ओर माओवादियों से बातचीत के लिए खुला रास्ता रखना चिदंबरम की रणनीति है। वे लालगढ़ जाकर यह भी संदेश देना चाहते थे कि नेताओं में साहस होना जरूरी है वरना माओवादियों के लिए खुला मैदान छूट जाएगा। माओवाद प्रभावित इलाकों में बड़े नेताओं और अधिकारियों के जाने से स्थानीय राजनेताओं और प्रशासनिक कर्मचारियों में भी साहस और भरोसा बढ़ता है। अगर देश का या प्रदेश का गृहमंत्री देश या प्रदेश के किसी इलाके में कदम न रख सके तो यह हिंसा के बल पर चुनौती देने वालों की जीत ही कही जाएगी। चिदंबरम के लालगढ़ के दौरे में ये कई संदेश स्पष्ट होते हैं।

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