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सरकार के दावे और रोजगार

नया वित्तीय वर्ष शुरू हो गया है। अपने देश में ऐसे पढ़े-लिखे युवा जरूर हैं, जो बड़े अरमान से अपनी नौकरी का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें ऐसे लोगों से जलन भी हो रही होगी, जिन्हें इस बीच रोजगार मिल गया। हमारे स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय ने बड़े-बड़े दावे किए थे। उनके मुताबिक 80 फीसदी ग्रेजुएट को नौकरी के ऑफर फरवरी में ही मिल गए थे, लेकिन वह दावा सही साबित होता नहीं नजर आता। अभी ढेरों युवा ग्रेजुएट उन ऑफर को नौकरी में तब्दील होते नहीं देख पाए हैं। अब तो आर्थिक मंदी भी नहीं रही है। अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है, लेकिन रोजगार को लेकर हालात सुधर नहीं रहे हैं। इन ग्रेजुएट युवाओं की दिक्कत यह है कि उन्हें स्थायी नौकरी के अभाव में इधर-उधर कुछ करना पड़ता है। धीरे-धीरे उन्हें ‘चुक गई पीढ़ी’ करार दे दिया जाता है। इस तरह अपने युवाओं का भटकाव खुद उनके लिए तो खतरनाक है ही देश और समाज के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है। अपने युवाओं को यों ही भटकने के लिए नहीं छोड़ सकती अपनी सरकार।
असाही शिंबुन, जापान


सदन में कुछ काम भी होते हैं
कई महीनों के बाद संसद की कार्यवाही शुरू हो रही है। पिछले कुछ वक्त से सदन महज बैंक सेंचुरी के ‘बेल आउट’ को लेकर ही हंगामा मचाता रहा है। देश में भी जैसे उसके अलावा कोई मसला न हो। राष्ट्रपति सुसीलो बाम्बंग युधोयोनो ने अक्टूबर में दूसरी बार शपथ ली थी। अजीब बात है कि उसके बाद से सदन ने एक भी विधेयक पारित नहीं किया है। ये कानून बनाने वाले सारे वक्त अपनी निजी लड़ाइयों में ही लगे रहे हैं। उनके सामने 70 विधेयक लटके पड़े हैं, लेकिन उसके लिए वक्त ही उनके पास नहीं है।
जकार्ता ग्लोब, इंडोनेशिया

 

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