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ये पहले ही कर चुके हैं गाउन को डाउन

-महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में गाउन की परम्परा को पहले ही अलविदा कहा जा चुका है। यहाँ दीक्षांत समारोह में गांधी टोपी और एक साधारण बैज पहना जाता है
-अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में भी गाउन नहीं शेरवानी और अलीगढ़ी पायजामा पहना जाता है
-आईआईटी बॉम्बे में पाँच-छह साल पहले गाउन को अलविदा कहा गया और दीक्षांत समारोह में उत्तरीय (सफेद कुर्ता-पायजामा) और बैज पहनने की परम्परा शुरू की गई

लखनऊ विश्वविद्यालय के रीडर डॉ. मनोज दीक्षित और प्रो. राकेश चंद्रा बताते हैं कि ऐसे दजर्नों उच्च शिक्षा संस्थान हैं जो ‘औपनिवेशिक काल के अवशेष’ गाउन को अलविदा कह चुके हैं। राजस्थान के वनस्थली विद्यापीठ और शान्ति निकेतन में भी दीक्षांत समारोह के दौरान गाउन पहनने की परम्परा तोड़ी जा चुकी है।

डॉ. मनोज दीक्षित सुझाव देते हैं कि यदि गरिमा का ध्यान रखना है तो राष्ट्रीय परिधान (बंद गले के कोट और पैंट) को दीक्षांत समारोह में पहना जा सकता है। बेहतर होगा कि पुराने संस्थान अपनी पहचान के अनुकूल दीक्षांत समारोह की ड्रेस निर्धारित करें। लुआक्टा अध्यक्ष मौलीन्दु मिश्र सवाल करते हैं, हम गांधी के देश में खादी के परिधान को दीक्षांत समारोह की ड्रेस क्यों नहीं बना सकते। डॉ. दीक्षित वकीलों के काले कोट पर भी सवाल उठाते हैं। प्रो. राकेश चंद्रा कहते हैं कि दीक्षांत समारोह की ड्रेस बदलना कोई बहुत बड़ी प्रक्रिया नहीं है। विश्वविद्यालय कार्य परिषद में एक प्रस्ताव पारित कर यह किया जा सकता है।

कुलाधिपति को भेजा जा सकता है प्रस्ताव
लविवि में आईपीपीआर के निदेशक प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि हमारे कुलपति भी गाउन के विकल्प के समर्थक हैं। विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्था है इसलिए गाउन को त्यागने में कोई दिक्कत नहीं है। इस संदर्भ में कुलाधिपति को एक प्रस्ताव भेजा जा सकता है।

कैसे पड़ी परम्परा
दीक्षांत समारोह में गाउन पहनने की परम्परा 13वीं शताब्दी में उस समय पड़ी जब ब्रिटेन में पोप के प्रभाव से धार्मिक शिक्षा की शुरुआत हुई। सबसे पहले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह में मैरून, गोल्ड, रेड और काले रंग का गाउन व बैज पहनने का प्रचलन शुरू हुआ। यह वहाँ के सर्द मौसम के अनुकूल था। जब अंग्रेजों ने भारत में युनिवर्सिटी सिस्टम शुरू किया तो यह परम्परा भी चली आई।

जो कहा सही कहा, जो किया वो गलत
लखनऊ विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. राकेश चंद्रा और आईपीपीआर के निदेशक प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जो कुछ कहा वह सही है, उस पर बहस और विचार दोनों होना चाहिए लेकिन उन्होंने जो किया (कार्यक्रम के बीच में गाउन व टोपी उतार देना) वह शोभनीय नहीं है। दीक्षांत समारोह एक औपचारिक कार्यक्रम है। यदि वह संजीदा हैं तो प्रयास कर मानव संसाधन मंत्रालय से एक सर्कुलर जारी करा सकते हैं।

यूपी में सिर्फ आगरा से आते हैं गाउन
यूपी में सिर्फ आगरा में ही एक कंपनी है जो सभी जगह गाउन सप्लाई करती है। इसके अलावा दिल्ली में गाउन सप्लायर हैं। लविवि रजिस्ट्रार जीपी त्रिपाठी बताते हैं कि छात्रों और एकेडमिक काउंसिल के सदस्यों के लिए गाउन किराए पर मँगाए जाते हैं। विशिष्ट अतिथियों की माप के गाउन स्पेशल ऑर्डर देकर मँगाए जाते हैं जिनकी कीमत दो हजार के आसपास होती है। दीक्षांत समारोह के बाद ये गाउन किसी काम के नहीं रहते।

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