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लाडले की तैयारी में रोड़ा तो नहीं बन रहा दबाव

स्टूडेंट्स आजकल अपने कॅरियर के प्रति काफी गंभीर हो गए हैं। बारहवीं की परीक्षा से पहले ही स्टूडेंट्स मेडिकल, इंजीनियरिंग की तैयारी में जुट जाते हैं। उनका सारा समय कोचिंग, काउंसिलिंग और घर पर पढ़ाई में ही गुजर जाता है। तैयारी के दौरान स्टूडेंट्स को कोचिंग इंस्टीट्यूट में विभिन्न परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इन परीक्षाओं में सफल होने के बाद ही वे मेडिकल-इंजीनियरिंग के इंट्रेंस टेस्ट में बैठते हैं। इतना होने के बाद भी स्टूडेंट्स जब इंट्रेंस टेस्ट देकर आते हैं तो परीक्षा में पास होने के प्रति आश्वस्त नहीं दिखाई पड़ते।

इन सबके पीछे मुख्य कारण यही माना जा सकता है कि अभिभावकों की ओर से पड़ने वाला अनावश्यक दबाव स्टूडेंट्स को सफलता दिलाने में कहीं न कहीं रोड़ा बन रहा है। इस बात को स्टूडेंट्स खुलकर स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उन्हें अपने माता-पिता के बुने सपनों का ख्याल आ जाता है। बच्चा मेडिकल-इंजीनियरिंग में जाएं, वर्तमान समय में यह माता-पिता के लिए स्टेट्स सिंबल बन गया है। इस संबंध में कुछ परीक्षार्थियों-अभिभावकों ने बातचीत में कुछ ये जवाब मिले..

महेंद्रू में रहकर परीक्षा की तैयारी करने वाली रजनी पिछले दिनों जब सीबीएसई मेडिकल परीक्षा देकर कॉलेज से बाहर निकली तो उसके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। उसने पूछने पर बताया कि सभी पेपर्स अच्छे थे, फिजिक्स को छोड़कर। वह फिजिक्स के पेपर को लेकर काफी चिंतित थी और बोली कि परीक्षा तो दे दी है, लेकिन पता नहीं रिजल्ट कैसा आएगा। रजनी ने पिछले वर्ष 12वीं की परीक्षा पास की है। यह दूसरा मौका होगा जब उसने मेडिकल की परीक्षा दी है। पिछले एक वर्ष में उसने वीकली, क्वार्टरली, टर्मिनल और बम्पर सहित करीब 38 परीक्षाएं दी हैं। इतनी सारी परीक्षाओं में पास होने के बावजूद वह मेडिकल इंट्रेंस परीक्षा को लेकर पसोपेश में है।

वहीं राजाबाजार निवासी राकेश भी इससे पहले कई परीक्षाएं दे चुका है, लेकिन वह भी सीबीएसई मेडिकल परीक्षा के परिणाम को लेकर काफी घबराया हुआ है। उसने परीक्षा परिणाम को लेकर हुई बातचीत में यही शब्द बोले ‘जाने क्या होगा रामा रे..’ रजनी व राकेश की तरह ही गर्दनीबाग के रंजन के मन में भी परीक्षा परिणाम को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है।

गांधी मैदान के पास रहकर परीक्षा की तैयारी करने वाली मनीषा भी सीबीएसई मेडिकल की प्रवेश परीक्षा कई बार दे चुकी है, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। इस बार भी उसने परीक्षा तो दी है, लेकिन परिणाम को लेकर वह टेंशन में है कि क्या होगा। उसने कहा कि इतने दबाव में प्रवेश परीक्षा क्लीयर करना काफी मुश्किल हो गया है। बकौल मनीषा, माता-पिता परीक्षा की तैयारी के लिए बच्चों पर अपना समय और धन दोनों खर्च कर देते हैं। इसके बाद जब रिजल्ट नेगेटिव रहता है तो काफी दुख होता है।

रजनी, राकेश और मनीषा की तरह आलोक कुमार, चेतना, रश्मि, शुभम, रितिका व रोशन आदि ऐसे अनेक स्टूडेंट्स हैं जो कोचिंग संस्थान एवं स्कूल में लगातार परीक्षा पास करने के बाद भी अपने कॅरियर के बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन इनके अभिभावक इन्हें लेकर कई तरह के सपने बुने बैठे हैं। राकेश की मां कहती हैं कि मैं हमेशा उसे पढ़ने और परीक्षा की तैयारी के लिए कहती हूं। खुद उसे लेकर कोचिंग सेंटर जाती हूं, ताकि घर आने में लेट न हो। टीवी देखना, दोस्तों के साथ घूमना, वीडियो गेम्स खेलना पूरी तरह बंद है। दिन में 15 घंटे पढ़ाई करना उसके लिए जरूरी कर रखा है।

पटना में ही रहकर मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा निशांत कुमार पिछले तीन साल से प्रवेश परीक्षा दे रहा है। तीन अप्रैल को परीक्षा देने के बाद भी वह आश्वस्त नहीं है कि इस बार सफलता उसके कदम चूमेगी या नहीं। उधर, महेंद्रू में रहने वाली ईशा का बेटा इस बार प्लस टू की परीक्षा में बैठा है। परीक्षा के दौरान ईशा ने दो महीने की छुट्टी लेकर बेटे की देखभाल की। वह अपने बेटे को ज्यादा से ज्यादा समय देना अपनी प्राथमिकता मानती हैं। कहती हैं, ‘आजकल सभी के एक या दो बच्चे होते हैं। उनके लिए माता-पिता अपना सारा समय और पैसा लगा देते हैं।’

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