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वंशवाद में जकड़ा भारतीय लोकतंत्र

तमिलनाडु में एक राजनीतिक भूचाल की आहट सुनाई पड़ने लगी है। करुणानिधि अभी जिंदा हैं और उनकी जगह लेने के लिए बेटों में जंग शुरू हो गई है। करुणानिधि तो लंबे समय से स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं और पार्टी को इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है, लेकिन अचानक आ गये अलागिरी। करुणानिधि के बड़े बेटे और तमिलनाडु की राजनीति के बाहुबली। खास बात यह है कि अलागिरी की दावेदारी करुणानिधि की इच्छा के खिलाफ है।

तमिलनाडु के दो भाइयों की इस कहानी ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के उस महाभारत की याद दिला दी है जहां हर नेता धृतराष्ट्र है और परिवारवाद एक सच्चाई। इस कुरुक्षेत्र में धृतराष्ट्र के लिये न नीति महत्वपूर्ण है और न ही लोकतंत्र। अहम है पार्टी के सीने में मजबूती से लगा परिवार का खूंटा। और खूंटे से बंधे-टंगे वो नेता जिनकी न जमीन है और न ही ईमान। ऐसे में करुणानिधि को ही पूरे खेल का विलेन क्यों मानें? कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी नेता के भेष में बाप हैं और बाप के रूप में धृतराष्ट्र।’

शेख अब्दुल्ला गये तो फारुक आ गए और फारुक के बाद उमर अब्दुल्ला। दूसरी तरफ हैं मुफ्ती सईद और उनकी बेटी महबूबा। पड़ोस के पंजाब में प्रकाश सिंह बादल हैं तो बेटे सुखबीर बादल भी, कुछ और रिश्तेदार भी पार्टी पर काबिज हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के परिवार का जिक्र करने की जरूरत नहीं, बिहार में लालू परिवार के बारे में तो सभी को पता है।

हरियाणा में भजनलाल का कुनबा है तो देवीलाल, बंसीलाल, भुपिंदर सिंह हुड्डा और शमशेर सिंह सुरजेवाला का खानदान भी। मध्य प्रदेश में सिंधिया परिवार है तो अर्जुन सिंह कहां पीछे रहने वाले हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार बेटी सुप्रिया को एनसीपी की बागडोर सौंप के ही मानेंगे। शिवसेना में बाला साहेब ठाकरे की पसंद हैं उद्धव। कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार और आंध्र प्रदेश में एनटीआर परिवार भला कहां किसी से पीछे हैं। मजेदार बात यह है कि एमजीआर की विरासत को लेकर एआईडीएमके में कशमकश पत्नी जानकी रामचन्द्रन और प्रेमिका जयललिता में ही हुई किसी दूसरे नेता में इतना बूता कहां था। और इन सबसे ऊपर नेहरू-गांधी परिवार।

कहीं हमारे लोकतंत्र में तो कोई खामी नहीं है? आखिर कहीं कुछ तो होगा कि उड़ीसा के लोग एक निहायत ही नये नवेले नवीन पटनायक को लगातार तीन बार मुख्यमंत्री के तौर पर मान लेते हैं। बीजू बाबू राजनेता थे लेकिन नवीन का राजनीति से क्या लेना देना? वे आराम से न्यूयार्क में थे, पैराट्रपर्स की तरह उतरे और छा गए।

गहरे उतर के देखें तो पंडित नेहरू के पहले देश की राजनीति में इस परिवारवाद की जड़ें दिखाई नहीं पड़तीं। जवाहर लाल नेहरू दिसंबर 1929 में जब लाहौर सम्मेलन में कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने पिता मोतीलाल नेहरू से ली थी जो तब कांग्रेस के अध्यक्ष थे। हालांकि जवाहर लाल और मोतीलाल दोनों के विचारों में भारी अंतर था। जहां जवाहर लाल पूर्ण स्वराज के पक्ष में थे वहीं मोतीलाल अंग्रेजों से सिर्फ डोमिनियन स्टेटस ही चाहते थे। शायद तब इतना लोकतंत्र था कि बेटा बाप के विचारों के खिलाफ जा सकता था।

नेहरू जी ने इंदिरा गांधी को बाकायदा बड़ी जिम्मेदारियों के लिए ट्रेंड किया। यह अलग बात है कि इंदिरा प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद बनी और इसमें नेहरू का कोई रोल नहीं था। देश पर परिवारवाद थोपने के लिए पार्टी ही जिम्मेदार थी। इंदिरा ने भी पहले संजय और बाद में राजीव को आगे बढ़ाया लेकिन राजीव को प्रधानमंत्री बनाने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। उन्हें भी पार्टी ने ही कुर्सी परोस कर दी। राजीव के बाद सोनिया के लाख इनकार के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने अध्यक्ष पद लेने के लिए मजबूर किया। यह अलग बात है कि राहुल की ताजपोशी की पूरी तैयारी अभी से की जा रही है।

इस बहस में तीन बातें उभर कर सामने आती हैं। एक, नेहरू-गांधी परिवार हो या फिर कोई और सभी अपने जीते जी अपने उत्तराधिकारी के लिए परिवार के ही सदस्य को ही आगे बढ़ाते हैं। दो, बीजेपी और वामपंथी पार्टियों को छोड़कर पार्टी अपने नेता के सामने पूरी तरह से नतमस्तक रहती है। पार्टी परिवारवाद का विरोध नहीं करती। परिवारवाद में अपना भविष्य देखती है। जैसे कि इंदिरा के बाद राजीव और राजीव के बाद सोनिया की ताजपोशी इसलिए की गई कि सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार का व्यक्ति ही पार्टी को एकजुट रख सकता है।

तीन, जनता-जनार्दन भी पार्टी के द्वारा ऊपर से थोपे गए ऐसे परिवारवादी नेतृत्व को स्वीकार कर लेती है। नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के जमाने में कांग्रेस का जनाधार लगातार कम हुआ और पार्टी काफी कमजोर हुई, जबकि सोनिया के आने पर पार्टी को मजबूती मिली। बीजू की मौत के बाद बीजू जनता दल बना जरूर लेकिन उसको संभाले रहने के लिए नवीन को राजनीति में लाना जरूरी था और नवीन की तमाम कमजोरियों के बाद भी उड़ीसा के लोगों ने उन पर विश्वास किया, बीजू के साथ के दूसरे नेताओं को नकार दिया। यह खामी किस स्तर पर है? राजनीति के स्तर पर या फिर समाज के स्तर पर?

मेरा यह मानना है कि दिक्कत समाज के स्तर पर है। भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया को अभी विकास की प्रक्रिया में काफी मशक्कत करनी है। वो आधुनिक होने का दावा तो करता है लेकिन अभी भी सामंतवाद की गिरफ्त से निकल नहीं पाया है। यह सामंतवादी असर है कि महिलाओं को कमतर समझने के बाद भी सिर्फ इसलिए श्रीलंका में श्रीमाओ भंडारनायके, पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो, भारत में इंदिरा गांधी और बांग्लादेश में शेख हसीना को प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार कर लिया जाता है। इन सबकी एकमात्र खूबी थी अपने देश के एक बहुत ताकतवर परिवार का सदस्य होना।

भारतीय संदर्भ में तो अवतारवाद की वजह से यह परंपरा हमारे और आपके मानस में और गहरे धंसी हुई है। अवतारवाद और सामंतवाद की बुनियाद गैर-बराबरी पर टिकी है। अवतार की तरह सामंत बाकी लोगों से अलग होते, प्रिविलेज्ड, सर्वशक्तिमान, सार्वभौम। इन पर वही नियम नहीं लागू होते जो आमजन के लिए होते हैं। और जनता इन सामंतों अवतारों के सामने समर्पण में अपना कल्याण देखती है और सुरक्षा भी। यह रिश्ता धार्मिक भाषा में भगवान और भक्त का सा होता है। यह सोच लोकतंत्र और आधुनिकता के खिलाफ है। यह परंपरा खत्म होनी चाहिए और नेता और पार्टी और जनता का रिश्ता बराबरी का होना चाहिए, भगवान और भक्त का नहीं।
 
लेखक आईबीएन-7 में मैनेजिंग एडीटर हैं।

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