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साइकिल के सुख

सुनते हैं कि इधर कुछ सांसदों को अक्ल आई है। वह सदन के सफर खातिर साइकिल के प्रयोग की योजना बना रहे हैं। वह बधाई के हकदार हैं। कौन नहीं चाहता है कि शहरों में साइकिल का समाजवाद आये जैसे गाँवों में टैक्टर-बैलगाड़ी का है। अपने शहर में तो रिक्शे, इक्के, तांगे, स्कूटर, नगर बस, दुपहिये, तिपहिये, क्या-क्या नहीं है, वैसे ही जैसे मुल्क में अजीर्ण से पीड़ित, भरे पेट, भूख ग्रसित दाने-दाने को तरसते हुए इंसानों की विविधता है।

तेज गति के वाहन सवारियों के पैरों को तो निकम्मा करते हैं, प्रदूषण भी बढ़ाते हैं। उस पर सरकारी खजाने में जब भी कमी आती है तो सरकार सर्विस टैक्स बढ़ाती है या डीजल-पेट्रोल की कीमत। जनता की गाढ़ी कमाई, दोनों हाथों से लुटाना, सत्ताधारियों का शौक है। कभी राजा-महाराजा हाथी-घोड़े से सफर करते थे, उनके वर्तमान सत्ता-अवतार हैलीकॉप्टर, हवाई जहाज से। पता लगा कि उड़ते-उड़ते हाजत आई तो फरमान जारी हो गया, ‘ड्राईवर, जरा वापस घर की ओर ले।’

साइकिल में आराम है। अपन जैसों को दाल और पेट्रोल में चयन का विकल्प है तो कौन पागल पेट्रोल को चुनेगा? वर्जिश की वर्जिश और सुन्दरी को देखकर सीटी बजाने का अलौकिक आनंद। अपने मोहल्ले के बांके बाबू बताते हैं कि वह पिछले दस साल से साइकिल से दफ्तर आ जा रहे हैं! तब से उन्होंने किसी खून चूस डॉक्टर की शक्ल तक नहीं देखी है।

अपनी तो इकलौती हसरत है। सरकार शहरों में साइकिल अनिवार्य कर दे। न नगर बस का दानवीय मशीनी हत्यारा रहेगा, न दुर्घटनायें होंगी। कौन कहे, उड़ाऊ, टरकाऊ, खाऊ नेताओं को भी शर्म आये। यों सियासी कौम, लाज, शर्म, उसूल, आत्मसम्मान, हया-प्रूफ है। पर उम्मीद में क्या हर्ज है?

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