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आजादी का गणराज्य

कंपनियां मुनाफे के लिए काम करती हैं और बड़ी कंपनियां बड़े मुनाफे के लिए कारोबार करती हैं। वे मुनाफे के लिए कमजोर सरकारों को खरीद लेती हैं और अगर वे बिकने के लिए तैयार नहीं होतीं तो उन्हें गिरा भी देती हैं। कंपनियां बड़ी सरकारों से समझौता भी करती हैं ताकि उनके मुनाफे में कोई रुकावट न आए और उनका कारोबार चलता रहे।

लेकिन कई कंपनियां इस आम धारणा के विपरीत भी काम करती हैं। उनके लिए मुनाफे से ज्यादा अहमियत इंसानी आजादी और मूल्यों की होती है। मीडिया कंपनियों का कारोबार कुछ ऐसा ही होता है। इस दिशा में अगुआ होकर उभरी है अमेरिकी इंटरनेट कंपनी गूगल। अब तक यह बहुत सुना जाता रहा है कि कंपनियों ने अपनी व्यावसायिक आजादी और हित के लिए अपनी सरकार से संरक्षण पाने और दूसरे देश पर दबाव बनाने की लाबिंग की है।

लेकिन ऐसा संभवत: पहली बार देखा जा रहा है कि चीन की सरकार से टकराव के चलते गूगल अपनी सरकार से इंटरनेट पर आजादी के सिलसिले में एक विदेश नीति की मांग कर रही है। उसके इस आह्वान का जबानी समर्थन तो विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कर दिया है पर उन्होंने इस लड़ाई को कंपनी के कंधे पर ही छोड़ दिया है। वजह अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग विदेश नीति का होना है।

गूगल को यह जरूरत तब आन पड़ी जब पिछले दिनों चीन के तिब्बत और उइगुर जैसे इलाकों में चले सरकार विरोधी आंदोलनों और उनके दमन के बाद चीन सरकार ने गूगल की साइट को हैक कर कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परेशान किया।

साइबर स्पेस अब ऐसा मैदान बन चुका है जहां एक तरफ अभिव्यक्ति की असीम आजादी के योद्धा खड़े हैं तो दूसरी तरफ उनकी पहचान करने वाले जासूस और उनका दमन करने वाली सरकारें अपनी तोप-तलवार लेकर उपस्थित हैं। इस आजादी से भयभीत सरकारें और मुनाफे के लिए काम करने वाली कंपनियां रोक लगाने के लिए नए -नए उपकरण और नीतियां तैयार कर रही हैं। जिस तरह रूसो ने इंसान के लिए कहा था कि वह आजाद पैदा हुआ तो है लेकिन हर जगह जंजीरों में जकड़ा हुआ है वही स्थिति आज इंटरनेट के लिए भी कही जा सकती है।
  
हर देश की अपनी राजनीतिक व्यवस्था और स्थितियां इंटरनेट की आजादी को अपने ढंग से सीमित करना चाहती हैं। अगर ईरान के असंतुष्ट नागरिक अपनी असहमति की अभिव्यक्ति के लिए इंटरनेट की सुविधा चाहते हैं तो वहां की सरकार जैमर लगाकर उसे रोकने की कोशिश करती है। ईरान सरकार के इस काम में अमेरिकी पाबंदी वाली नीतियां चुनौती देने के बजाय मदद करती ही दिख रही हैं।

आजादी चाहने वालों की अमेरिकी सरकार से शिकायत है कि वह उन कंपनियों के बारे में एक नीति नहीं बना रही है जो इंटरनेट को सेंसर करने वाली प्रौद्योगिकी निर्यात करती है। न ही वह ऐसी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त धन दे रही है जो इंटरनेट की आजादी पर लगने वाली जंजीरों को तोड़ सकती है। अभिव्यक्ति की आजादी की इस जंग में व्यावसायिक आजादी के तर्क की भी मदद ली जा रही है। गूगल की लड़ाई दिलचस्प है और यह मानवीय मूल्यों के वैश्वीकरण को बढ़ावा देगी। इसलिए इसमें उन सभी को ताकत लगानी चाहिए जिन्हें नागरिक अधिकारों से प्यार है।

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