DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

..तो खुल जाएगा सारा भेद

ब्रह्मांड कैसे बना, पदार्थ कहां से अस्तित्व में आया, इन प्रश्नों को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक सदियों से परेशान होते आ रहे हैं। कुछ उत्तर मिले भी, लेकिन जिज्ञासा शांत नहीं हुई। उन्होंने अंतत: पदार्थ के अविभाज्य कणों के अतीत में जाकर उन स्थितियों को देखने की पहल की है।

अंतरिक्ष में अरबों वर्ष पूर्व हुए महाविस्फोट से सृजन हुआ था ब्रह्मांड का। कणों से छोटे पिंडों और फिर मंदाकिनियों व तारों का निर्माण हुआ। इससे ग्रहों में पृथ्वी पर जीवन संभव हो सका और जीवन की विकास यात्रा आधुनिक मानव तक आन पहुँची।

दो साल के इंतजार के बाद टक्कर
लगभग दो साल के इंतजार के बाद महामशीन में प्रोटॉनों की कामयाब टक्कर हुई। इसका मकसद था जमीन के नीचे बनी द यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सीईआरएन) की लैब में बिग बैंग या ब्रह्मांड की शुरुआत जैसे नजारे को साकार होते देखना। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रयोग से इतने ज्यादा आंकड़े मिले हैं कि जिनके विश्लेषण में महीनों लग जाएंगे। प्रयोग की सही सफलता तभी आंकी जाएगी।

इस प्रयोग के दौरान रिकॉर्ड ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ और इसके साथ अब तक रहस्य के पर्दे में छिपे गॉड पार्टिकल की खोज का काम भी शुरू हो गया। इस प्रयोग इसलिए बहुत कठिन माना जा रहा था क्योंकि इसमें गलती की आशंकाएं बहुत ज्यादा थीं। स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा पर जमीन के नीचे बनी 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में ये प्रोटॉन बीम इतनी तेजी से घूम रही थी कि एक सेकंड में सुरंग के 11 हजार चक्कर लगा रही थीं।

चूंकि यह टक्कर प्रोटॉन जैसे सब-ऐटमिक पार्टिकल्स की होनी थी इसलिए सारी गणनाएं बहुत सटीक होनी चाहिए थीं वरना प्रोटॉन बीम एक दूसरे को क्रॉस कर जातीं। इस प्रयोग के शुरू में इस तरह की आशंकाएं जताई गई थीं कि इसके दौरान ब्लैक होल बनेंगे जो हमारे ग्रह पृथ्वी को ही नष्ट कर डालेंगे। हालांकि सीईआरएन के वैज्ञानिकों ने इन्हें दरकिनार करते हुए कहा कि इससे कोई खतरा नहीं होगा क्योंकि अगर ब्लैक होल बने भी तो इतने मामूली होंगे कि पैदा होने के साथ ही नष्ट हो जाएं।

यह ब्रह्मांड जिस बिग बैंग के जरिए बना, उसके पहले जो परिस्थितियां थीं, उन्हें दोहराने की कोशिश की गई है। यहां मंगलवार को वैज्ञानिकों ने दो प्रोटॉन बीमों की टक्कर रिकॉर्ड स्पीड पर कराई। इस टक्कर के कई दूरगामी नतीजों की उम्मीद की जा रही है।

रिकॉर्ड ऊर्जा के लिए महाटक्कर, आशंकाएं बेबुनियाद
यही मानव अब यह जानने के लिए बेचैन है कि जिन कणों से पदार्थ का सृजन हुआ वे आदिकण और उनके अवयव कैसे थे। इसे जानने के लिए उसने बनाए त्वरक (एक्सेलेरेटर्स) जो कणों को उनकी मूलभूत स्थिति में ले जाएंगे।

ऊर्जा की उच्चतम स्थिति में ही इनके बारे में जानना संभव हो सकेगा और वैज्ञानिकों का मानना है कि लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) इसे संभव कर कर सकता है। हालांकि कुछ व्यक्तियों एवं वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग से पूरे विश्व के नष्ट हो जाने की आशंका और डर व्यक्त किया था तथा इस परियोजना के सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर न्यायालय के माध्यम से सवाल उठाए थे, परंतु वैज्ञानिक समुदाय ने इनको बेबुनियाद करार दिया। न्यायालय ने भी इस परियोजना पर रोक लगाए जाने की याचिका को नामंजूर कर दिया है।

कब-कब आई प्रयोग में दिक्कत
सितंबर 2008 को दो अतिचालक चुम्बकों में खराबी आ जाने के कारण इस प्रयोग को रोक देना पड़ा था। 19 सितंबर को हुई तकनीकी नाकामी के पीछे एक खराब इलेक्ट्रिक कनेक्शन को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसकी वजह से सुपर कोल्ड हीलियम लीक हो गई थी और लगभग 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इसके बाद इस मशीन में लगे 53 चुंबकों को 17 मील की अंडरग्राउंड सुरंग से निकाल कर बाहर लाया गया और उनकी सफाई की गई। इस दौरान दो और खराब कनेक्शन पाए गए। 20 नवंबर, 2009 को फिर से इसमें प्रोटॉन बीम को सर्कुलेट कराया गया। तीन दिन के बाद प्रोटॉन की पहली भिड़ंत रिकॉर्ड की जा सकी थी।

इस मार्च को इस मशीन में वैज्ञानिक दो प्रोटॉन किरणों की आमने-सामने की महाटक्कर करवाने में सफल रहे। अब तक किसी मशीन से पैदा किए गए सबसे अधिक बल से करवाई गई इस टक्कर से रिकॉर्ड ऊर्जा पैदा हुई। मार्च, 2010 को  हुए प्रयोग की शुरुआत में कुछ दिक्कतें सामने आईं। पावर सप्लाई और ओवर सेंसेटिव मैगनेट सेफ्टी सिस्टम की गड़बड़ी की वजह से कुछ घंटों की देरी हुई। इसके चलते कुछ देर के लिए इस टक्कर को रोककर रिपेयर का काम करना पड़ा हालांकि लॉर्ज ह्रेडॉन कोलाइडर के वैज्ञानिकों का कहना था कि यह गड़बड़ी सितंबर 2008 में हुई तकनीकी समस्या से एकदम अलग थी। 

अनसुलझे रहस्यों से खुलेगा रहस्य
ब्रह्मांड में जो कुछ दिखता है वो पदार्थ से निर्मित है। वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि जो नहीं दिखता है, वह पदार्थ के आधारभूत अविभाज्य कण होंगे और बिग बैंग के समय उच्च तापमान पर इन्हीं अविभाज्य कणों का साम्राज्य रहा होगा। सर्न में स्टैंडर्ड मॉडल के जरिए वैज्ञानिक इस अवधारणा को अपने स्तर पर परख चुके हैं। अब वे महाविस्फोट करके देखेंगे एलएचसी के प्रयोग से इन प्रश्नों को सुलझाने में मदद मिलेगी।

कैसा था महाविस्फोट?
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संबंध में सबसे प्रचलित सिद्धांत ‘बिग बैंग’ यानी महाविस्फोट का है। अरबों वर्ष पूर्व यह विस्फोट उन तमाम विस्फोटों से अलग था, जिन्हें हम जानते हैं। बिग बैंग एक ऐसा विस्फोट था, जो शून्य से उपजा था। इस विस्फोट से अत्यंत गर्म और अत्यंत सघन पदार्थ पूरे अंतरिक्ष में भर गया था। तब अनुमानित तापमान रहा होगा खरब डिग्री सेंटीग्रेट। इतने तापमान पर सामान्य पदार्थ के कोई भी घटक अणु, परमाणु या यहां तक कि परमाणु के नाभिक का एक साथ रह पाना संभव नहीं था। सब कुछ एक अंतरिक्षीय घोल (कॉस्मिक सूप) में बदल चुका था।

अभी तक ब्रह्मांड की उत्पत्ति के इस प्रथम क्षण की वैज्ञानिक सिर्फ कल्पना ही कर पाए थे। कणों से परे देखने और जानने की उनकी जिज्ञासा ने ही क्वांटम फिजिक्स को जन्म दिया।

भारत भी हिस्सेदार
दुनिया के इस सबसे बड़े कण त्वरक (एलएचसी) के निर्माण में भारत ने यांत्रिक सामग्री जुटाने में सहयोग किया है। नाभिकीय अनुसंधान के यूरोपीय संगठन ‘सर्न’ ने इस लार्ज ह्रेडॉन कोलाइडर का निर्माण अंतरराष्ट्रीय सहयोग से किया है। इसमें भागीदार देशों में भारत भी शामिल है। विशेषकर इंदौर स्थित राजा रमन्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र ने इस त्वरक के लिए कई अवयवों का निर्माण किया है। इससे भारत की तकनीकी क्षमता पर अंतरराष्ट्रीय मुहर लग गई है।

गॉड पार्टकिल
टक्कर के आंकड़ों का विश्लेषण हिग्स बोसन की खोज में मदद कर सकता है। हिग्स बोसन को गॉड पार्टिकल भी कहा जाता है। माना जाता है कि ब्रह्मांड के निर्माण से पहले यह मौजूद था। दरअसल, वैज्ञानिक एक सवाल पर हमेशा से बहस करते रहे हैं कि ब्रह्मांड की चीजें, यहां तक कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे मूल अणुओं में द्रव्यमान कहां से आता है।

द्रव्यमान को बोलचाल की भाषा में हम वजन समझ लेते हैं लेकिन यह वजन से अलग है। असल में जब द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करती तो वजन पैदा होता है। उदाहरण के लिए अगर हम चांद पर जाएं तो हमारे शरीर का द्रव्यमान तो वही रहेगा लेकिन उसका वजन कम हो जाएगा। इसीलिए चांद पर गुरुत्व में कमी आने से हमारा वजन घट जाता है।

द्रव्यमान की व्याख्या के लिए 1964 में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने एक थ्योरी दी थी। इसके मुताबिक, गॉड पार्टिकल या हिग्स बोसन ही चीजों में द्रव्यमान का कारण हैं। इस व्याख्या के बाद वैज्ञानिक इस कण की खोज में जुट गए। यही खोज फ्रांस और स्विट्जरलैंड बर्डर के नीचे यूरोपियन अर्गनाइजेशन फर न्यूक्लियर रिसर्च (सीईआरएन) की महामशीन भी कर रही है।

बिग बैंग थ्योरी
हमारी सारी भौतिक मान्यताएं बस एक घटना से परिभाषित होती हैं - बिग बैंग थ्योरी। बिग बैंग एक जोरदार धमाका था, जिसके बाद ब्रह्मांड अस्तित्व में आया था। बिग बैंग या महाविस्फोट के सिद्धांत के अनुसार तकरीबन 15 अरब वर्ष पहले संपूर्ण ब्रह्मांड एक परमाणविक इकाई के रूप में था और समस्त भौतिक तत्व एवं ऊर्जा एक बेहद छोटे से बिंदु के रूप में सिमटे हुए थे। उससे पहले क्या था, कोई नहीं जानता। यह वह समय था, जब समय और स्थान भी नहीं था। वह बिंदु अपने आप में इतना सघन और गर्म था कि उसमें जोरदार विस्फोट हुआ था।

उसके बाद इस बिंदु ने फैलना शुरू किया था। उस प्रारंभिक ब्रह्मांड के कण समूचे अंतरिक्ष में फैल गए थे और एक-दूसरे से दूर जाने लगे थे। बिग बैंग मॉडल के अनुसार इस धमाके में इतनी अधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ जिसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैल रहा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अंतरिक्ष लगातार फैल रहा है। सीधे शब्दों में कहा जाए कि बिग बैंग सभी के मन में उठने वाली इस जिज्ञासा कि ब्रह्मांड कैसे बना था, का जवाब तलाशता है, तो गलत न होगा।

कौन से आधार करते हैं समर्थन
इस थ्योरी को कुछ आधार सपोर्ट करते हैं। पहला यह कि ब्रह्मांड में जो आकाशगंगाएं जितनी दूर हैं, वह उतनी ही गति से हम से दूर जा रही हैं। हबल के नियम से जाने जाना वाला यह सिद्धांत इस बात को प्रमाणित करता था कि ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है। दूसरा जैसा कि बिग बैंग सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड अपनी प्रारंभिक अवस्था में काफी गर्म था, ऐसे में इस गर्म स्थान में शेष बचे को तलाशने के लिए 1965 में दो वैज्ञानिक पेंजियाज और विल्सन ने कॉस्मिक माइक्रोवेव को देखा, जिससे इस बात को बल मिला कि कहीं कुछ शेष है।

वहां शोर को सुना गया, जो प्रत्येक दिशा से समान मात्र में आ रहा था। तीसरी बात यह कि ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्वों की प्रचुरता ने बिग बैंग सिद्धांत को बल दिया क्योंकि सिद्धांत कहता है कि ठंडे होने के बाद तत्व बनने लगे और हाइड्रोजन, हीलियम आदि के बनने की शुरुआत हो गई।

एलएचसी यानी लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर
लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) विश्व का सबसे विशाल और शक्तिशाली कण त्वरक है। यह सर्न की महत्वाकांक्षी परियोजना है। यह जेनेवा के समीप फ्रांस एंव स्विट्जरलैंड की सीमा पर जमीन के नीचे स्थित है। इसकी रचना एक किलोमीटर परिधि वाले एक छल्ले-नुमा सुरंग में हुई है।

इसी सुरंग में इस त्वरक के चुम्बक, डिटेक्टर, बीम-लाइन एवं अन्य उपकरण लगे हैं। सुरंग के अंदर दो बीम पाइपों में दो विपरीत दिशाओं से आ रही (टेरा इलैक्ट्रॉन वोल्ट्) की प्रोटॉन किरण-पुंजों (बीम) को आपस में टक्कर) कराया जायेगा जिससे वही स्थिति उत्पन्न की जाएगी जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय बिग बैंग के रूप में हुई थी। ध्यातव्य है कि टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा वाले प्रोटॉन का वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।

एलएचसी की सहायता से किए जाने वाले प्रयोगों का मुख्य उद्देश्य स्टैन्डर्ड मॉडल की सीमाओं एवं वैधता की जांच करना है। स्टैन्डर्ड मॉडल इस समय कण-भौतिकी का सबसे आधुनिक सैद्धांतिक व्याख्या या मॉडल है। इस परियोजना में विश्व के से अधिक देशों ने अपना योगदान किया है। परियोजना में भौतिक वैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं जो विभिन्न देशों या विश्वविद्यालयों से आए हैं।

प्रोटॉन बीम को त्वरित करने के लिए इसके कुछ अवयवों जैसे डाइपोल चुंबक, क्वार्डापोल चुंबक आदि) का तापमान लगभग 1.9 डिग्री केल्विन तक ठंडा करना आवश्यक होता है ताकि जिन चालकों में धारा बहती है वे अतिचालकता की अवस्था में आ जाएं और ये चुम्बक आवश्यक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न कर सकें।

इस प्रयोग में बोसोन कण के प्रकट होने तथा पहचाने जाने की उम्मीद है जिसके अस्तित्व की कल्पना अब तक सिर्फ गणनाओं द्वारा ही की जाती रही है। इसके द्वारा द्रव्य एवं ऊर्जा के संबधों को जानने की कोशिश का जा रही है। इससे ब्रह्मांड के उत्पत्ति से जुड़े कई रहस्यों पर से भी पर्दा उठने की शताब्दियों पुरानी इनसानी इच्छा को भी कुछ संतुष्टि मिली है।

यह पूरा ढांचा तीन अलग-अलग आकार के गोलों में बनाया गया है। लार्ज ह्रेडॉन कोलाइडर के अलग-अलग हिस्से प्रयोग के अलग-अलग परिणामों का विश्लेषण किया जाएगा। परमाणु के सूक्ष्म कणों की टक्कर और उनके प्रभाव से जुड़े आंकड़े सीईआरएन समेत पूरी दुनिया में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में लगे कंप्यूटरों में देखे गए हैं। प्रयोग के दौरान घट रही भौतिकीय घटनाओं को दर्ज करने के लिए विशालकाय कंप्यूटर ढांचा तैयार किया गया है और एक नए नेटवर्क से इसे पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के कंप्यूटरों से जोड़ा गया है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:..तो खुल जाएगा सारा भेद