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पैन है जरूरी

स्थायी खाता संख्या (परमानेंट एकाउंट नंबर यानी पैन) कार्ड लेना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। नए वित्तवर्ष में एक अप्रैल 2010 से आयकर छूट की सीमा को पार करने के बावजूद यदि आप अपना पैन नंबर मुहैया नहीं करवाते हैं, तो आपकी आय से 20 फीसदी तक टीडीएस यानी स्नोत पर कर काटा जा सकता है। अभी तक टीडीएस की दर 2 से 10 फीसदी  है।

कर का भुगतान करने वालों के लिए टैक्स रिटर्न के साथ पैन नंबर का जिक्र करना जरूरी होगा। इसके अलावा यदि आप कुछ खास लेन-देन जैसे अचल संपत्ति का क्रय-विक्रय, तय सीमा से अधिक बैंक डिपॉजिट और निर्धारित सीमा से अधिक म्यूचुअल फंड की खरीद  करते हैं तो भी आपके लिए पैन का जिक्र करना जरूरी होगा।

पैन नंबर अनिवार्य तौर पर मुहैया कराने से कर-विभाग का काम आसान हो जाएगा तथा वे बेहतर तरीके से ऑडिटिंग कर सकेंगे। अब कोई व्यक्ति ऐसी आय या राशि हासिल करता है जो आयकर की धारा 1961 के तहत कर के दायरे में आती है तो इसके लिए व्यक्ति को पैन देना जरूरी होगा।

पैन न देने की स्थिति में उससे होने वाली आय पर कर या 20 फीसदी की दर में से जो भी ज्यादा होगी, उतना टैक्स देना होगा। प्रवासी भारतीय जो कि भारतीय पक्षों के साथ सौदे करते हैं, उनके लिए भी पैन नंबर लेना अनिवार्य होगा। वरना उन्हें अपनी आय पर ऊंची दरों पर कर का भुगतान करना होगा।

कर भुगतान करने वाले व्यक्ति के लिए संबंधित संस्था को किसी भी पत्रचार, बिल या वाउचर व दूसरे दस्तावेज भेजते समय भी अपने पैन का जिक्र करना होगा। ऐसे मामले जिनमें भुगतान दूसरे मुल्कों में किया जाता है, वहां लेन-देन में पैन न दिए जाने पर 20 फीसदी की दर से कटौती होगी। घरेलू लेन-देन जैसे किराया, प्रोफेशनल भुगतान में भी पैन मुहैया कराना होगा।

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