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दो टूक

जनता की कमाई से हेर-फेर कर अकूत संपत्ति बनानेवाले राजनीतिज्ञ-अधिकारियों-ठेकेदारों के गंठाोड़ के खिलाफ इनकम टैक्स का छापा महा बानगी भर है। इस एक दृष्टांत से अंदाजा लग जाता है कि जो जहां है, राज्य को कैसे लूट रहा है। एक समय था कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकारं गिर जाती थीं, अब तो यह शिष्टाचार बन गया है। सवाल है कि जनता किसपर भरोसा कर। वो जिसे सरकार में चुन कर भेजती है, वह अपना पेट भरने में लग जाता है। विकास के लिए तय प्रणाली में हर कदम पर गिद्धों का डेरा है। इस लूट तंत्र की परतें लगातार खुल रही हैं। काश ऐसी ही चौकसी जनतांत्रिक सरकारें बरततीं, तो अधिकारी-ठेकेदार ऐश और जनता मातम नहीं कर रही होती।

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