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सदियों पुरानी कला में प्राण फूंकने की जद्दोजहद

सदियों पुरानी लौह धातुओं के निर्माण की कला में फिर से प्राण फूंकने की जद्दोजहद की जा रही है। बीएचयू में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों ने प्राचीन प्रौद्योगिकी को पुर्नजीवित करने का बीड़ा उठाया है। टीम लीडर प्रो. विभा त्रिपाठी ने बताया कि पूर्वाचल में चंदौली, सोनभद्र और मध्य प्रदेश के सिद्धी और रीवां तक के क्षेत्र में वन संपदा पर आधारित यह उद्योग 1500 ईसा पूर्व से फल-फूल रहा था। लेकिन 1950 में वन संरक्षण के लिए बने कानूनों का इस कला पर दुष्प्रभाव पड़ा और प्राचीन प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर अपना जीवन यापन करने वाली अगरिया, असुर व विरजिया आदि जनजातियों ने इस कला से दूरी बना ली जिससे यह पूर्णत: विलुप्त हो गई। पिछले पांच वर्षों के शोध में टीम ने इस क्षेत्र के विभिन्न गांवों में रहने वाले अगरिया लोगों से संपर्क किया जिनमें से कुछ ऐसे लोग भी मिले जो इस कला को पूरी तरह भूले नहीं थे।

ऐसे लोगों की मदद से परंपरागत तकनीक का इस्तेमाल करते हुए लोहे के सामान बनवाएं गए। प्रो. विभा त्रिपाठी ने बताया कि यह देखकर काफी अच्छा लगा की आज भी कुछ लोग ऐसे है जो पुरखों की प्रौद्योगिकी को सजोएं हुए है। बेरोजगारी का दंश झेल रहे अगरिया व अन्य जनजातियों के लोगों को इस कला को फिर से अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है जिसके लिए भारत विश्व स्तर पर प्रसिद्ध था।

20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक जनजातियों द्वारा लोहा काफी प्रचलित था और स्थानीय लोग फैक्ट्री में बने लोह सामानों की अपेक्षा इन जनजातियों द्वारा बनाए गए सामानों का अधिक उपयोग करते थे। प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि लंदन ब्रिज तक में प्राचीन भारतीय प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से लोहे का प्रयोग किया गया था। आज आवश्यकता है कि हम उसको पुर्नजीवित करें और पूर्णत: विलुप्त होने से बचाए। टीम में डा. प्रभाकर उपाध्याय, सुरेन्द्र यादव, तारकेश्वर नाथ पाण्डेय आदि शामिल है।

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  • Web Title:सदियों पुरानी कला में प्राण फूंकने की जद्दोजहद