DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यह आंगन है हजारों गौरेयों का बसेरा

कभी हम सबके आंगन में चहचहाने वाली गौरैया भले ही विलुप्त होने के कगार पर हो लेकिन उत्तर प्रदेश के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर के घर में इनका बसेरा देखकर कम से कम ऐसा प्रतीत नहीं होता है। 75 वर्षीय सेवानिवृत्त प्रोफेसर मदन मोहन शर्मा मेरठ शहर के सूरजकुंड इलाके में रहते हैं। उनके घर के आंगन में पिछले 50 सालों से हजारों  गौरैयों बसेरा करती आ रही हैं।

शर्मा ने कहा कि उन्हें इस बात से बहुत खुशी और हैरानी होती है कि जो गौरैया दुनियाभर से विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है, उनकी इतनी बड़ी जमात उनके घर में रहती है। उन्होंने कहा, ''मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि नित्य हजारों गौरैयों की चहचहाट सुनकर सुबह मेरी नींद खुलती है।''

शर्मा के आंगन में बैगनबेलिया के कई पुराने बड़े पेड़ हैं, जिन पर वर्तमान समय में करीब 3,000 से अधिक गौरैयों ने अपना बसेरा बना रखा है। भारी संख्या में गौरैयों के पंख फड़फड़ाने के कारण कभी उन पेड़ों में पत्ते नहीं उग पाते हैं।

रोज तड़के शर्मा गौरेयों को बाजरा चुगाकर पानी पिलाते हैं। चुगाने के लिए बकायदा उन्होंने पेड़ के नीचे बड़े थाल रखे हैं और पानी पिलाने के लिए छोटे-छोटे हौज बनवाए हैं। शर्मा कहते हैं कि सुबह चुगने के बाद गौरैया दिन भर घूमती-फिरती हैं और शाम को फिर चुगने के समय आ जाती हैं। रात उन्हीं बैगन बेलिया के पेड़ों पर ही बिताती हैं। शर्मा के घर में गौरैयों के आने की शुरुआत करीब 50 साल पहले हुई। शर्मा कहते हैं कि उनकी मां को पक्षियों से बहुत लगाव था। एक दिन करीब 10 गौरैयों का झुंड आंगन में आकर चहचहाने लगा। मां ने उन्हें देखकर एक थाली में बाजरा रख दिया। धीरे-धीरे वे रोज नियमित बाजरा चुगने आने लगी और तब से सिलसिला अनवरत जारी है।

मेरठ के एन.ए.एस कॉलेज में भौतिकीशास्त्र के प्रोफेसर रहे शर्मा के मुताबिक पहले उनकी मां बाजरा जुगाती थीं। उनके निधन के बाद सालों से वह नियिमत सुबह और शाम पक्षियों को दाना दे रहे हैं। शर्मा कहते हैं कि यह भी एक रहस्य है कि ये केवल बाजरा ही चुगती हैं। उन्होंने कई बार इन्हें चावल व अन्य अन्न के दाने चुगाने का प्रयास किया लेकिन गौरैयों ने उस पर मुंह नहीं मारा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:यह आंगन है हजारों गौरेयों का बसेरा