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विदेशी निवेशकों ने पकड़ी छोटे शहरों की डगर

विदेशी निवेशकों ने पकड़ी छोटे शहरों की डगर

विदेशी निवेशकों के निवेश के पसंदीदा स्थल के मामले में छोटे शहर महानगरों पर भारी पड़ रहे हैं। विदेशी निवेशक भारत में छोटे शहरों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।

सरकार द्वारा प्रायोजित एक अध्ययन के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने अपनी विनिर्माण इकाईयां लगाने के लिए बड़े शहरों और महानगरों की तुलना में छोटे कस्बों या शहरों को प्राथमिकता दी है। इससे देश के ग्रामीण इलाकों से उनका संपर्क आसानी से जुड़ा रहता है।

एनसीएईआर के अध्ययन के अनुसार, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आधारित विनिर्माण इकाइयों में ज्यादातर इकाईयां तीसरी श्रेणी के शहरों में स्थित हैं। अध्ययन में 294 शहरों में 401 एफडीआई आधारित विनिर्माण कंपनियों के 1,273 संयंत्रों को शामिल किया गया। अध्ययन के अनुसार, इनमें से 54 प्रतिशत संयंत्र छोटे शहरों में स्थित हैं।

2001 की जनगणना के मुताबिक, पांच लाख से कम की आबादी वाले शहर तीसरी श्रेणी में आते हैं। हालांकि, पिछले नौ साल के दौरान इन शहरों की आबादी में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। अध्ययन में कहा गया है कि माना जाता है कि ये शहर उपनगर हैं और देश के ग्रामीण इलाकों के नजदीक हैं।

औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) द्वारा प्रायोजित इस सर्वेक्षण यह बात सामने आई है कि एफडीआई आधारित विनिर्माण इकाइयों में कुल उत्पादन का लगभग आधा छोटे शहरों से आता है। ये विदेशी निवेश गैर धातु खनिज उत्पाद, निर्माण कलपुर्जा, लौह अयस्क के खनन, कपड़ा और फसल के उत्पादन या प्रसंस्करण के क्षेत्र में किए गए हैं।

जहां तक मूल्यवर्धित उत्पादों की बात आती है, तो खनिज, तंबाकू उत्पाद और जूता-चप्पल जैसे क्षेत्र इस मामले में अग्रणी हैं। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि एफडीआई आधारित विनिर्माण इकाइयों में श्रमिकों को घरेलू कंपनियों की तुलना में ज्यादा मजदूरी का भुगतान किया जाता है। फुटवियर, चिकित्सा उपकरण, बिजली वितरण और निर्माण कलपुर्जा जैसी एफडीआई आधारित इकाइयों में मजदूरी की दर कहीं अधिक है।

एनसीएईआर का यह अध्ययन 2001 से 2006 के बीच आंकड़ों तथा 2006 से 2008 के बीच कुछ मानदंडों पर आधारित हैं।

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