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संगीत ही नहीं हर चीज़ में है मिलावट

संगीत ही नहीं हर चीज़ में है मिलावट

शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में औदयोगिक घरानों द्वारा निवेश नहीं करने की बात करते हुए प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने कहा कि आज भले ही शास्त्रीय संगीत फायदे का सौदा न लगता हो, लेकिन आने वाले समय में संगीत देश विदेश में लोकप्रिय होगा और इसमें निवेश करने वालों की भी कमी नहीं रह जाएगी।

राजधानी में कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम में शिरकत करने आए बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने भाषा से ख़ास बातचीत में कहा, औदयोगिक घराने क्रिकेट जैसे खेलों और अन्य क्षेत्रों में खुलकर निवेश करते है, लेकिन शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में निवेश करने से कतराते हैं।
     
उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि औदयोगिक घरानों के मुखिया शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में निवेश करने के इच्छुक हैं, लेकिन पक्षपात की वजह से उनके सलाहकार उनको इस क्षेत्र निवेश करने से रोकते है, जिस कारण वो खुलकर सामने नहीं आते है।
     
उन्होंने कहा कि जिस तरह से शास्त्रीय संगीत देश विदेश में लोकप्रिय हो रहा है, उससे एक दिन ऐसा भी आएगा, जब औदयोगिक घराने इस क्षेत्र में खुलकर निवेश करेंगे।
     
एक प्रश्न के उत्तर में चौरसिया ने कहा, वर्तमान दौर में सिर्फ संगीत ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में मिलावट है।
उन्होंने कहा कि संगीत के जानकारों की बजाय अच्छा श्रोता सबसे बड़ा आलोचक होता है और उसी के कारण शास्त्रीय संगीत आगे बढ़ रहा है।
    
चौरसिया ने कहा कि पश्चिम के प्रभाव की वजह से आजकल के बच्चे आनन फानन में धन कमाना चाहते हैं और कुछ दिन शास्त्रीय संगीत सीखकर दौलत और शोहरत के पीछे भागने लगते हैं। उन्होंने कहा कि यह युग भी आना ज़रूरी है क्योंकि अगर लोगों के सामने किसी चीज़ का काला रूप सामने नहीं आएगा तो उनमें सफेद को पहचानने की ताक़त भी नहीं आ पाएगी। उन्होंने कहा कि आज के नौजवानों के अंदर की उर्जा को मशीनों ने छीन लिया है।
    
हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि आजकल के बच्चे हमारे दौर के बच्चों की तुलना में अधिक प्रतिभावान है और वो किसी भी चीज़ को जल्दी सीखने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने कहा, "यह कहना सरासर ग़लत होगा कि शास्त्रीय संगीत छोटे शहरों में बचा हुआ है, क्योंकि अधिकतर बड़े संगीतकार मेट्रो शहरों में रहते है। शास्त्रीय संगीत के तमाम शीर्ष कलाकार बड़े शहरों और विदेशों में बस गए हैं क्योंकि वहां रहकर धन कमाया जा सकता है।"
    
उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत के कलाकारों के गढ़ रेडियो में दबदबा अब ख़त्म हो गया है। कभी अपनी नेम प्लेट पर रेडियो आर्टिस्ट लिखना बड़े ही गर्व की बात मानी जाती थी। आजकल रेडियो में नए कलाकारों को बहुत कम मौका दिया है और बिना प्रायोजक के कलाकार को रेडियो में मौका नहीं दिया जाता। इसलिए औदयोगिक घराने अगर नए कलाकारों को प्रायोजित करेंगे तो शास्त्रीय संगीत का भला होगा।

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