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हाई-फाई पार्टियां देखते हैं क्या-क्या चलता है इनमें

हाई-फाई पार्टियां देखते हैं क्या-क्या चलता है इनमें

बॉलीवुड की फिल्मी पार्टियों में बंद दरवाजों के पीछे क्या होता है? आइए जानते हैं राजीव मसंद से जो उन महफिलों की असलियत तक पहुंच रखते हैं। इसके अलावा दिलीप चेरियन दिल्ली की पेज-थ्री पार्टियों में अक्सर होने वाले सवालों के जवाब दे रहे हैं।

यदि किसी को यह पता चल गया कि आपका फिल्मी दुनिया से कोई रिश्ता है, चाहे वह मीलों दूर का ही क्यों न हो, तो आपका कोई दोस्त, कोई दूर का रिश्तेदार, कोई सहकर्मी या कोई ऐसा भी जिससे आप कुछ मिनट पहले ही मिले हो, इस बात के लिए चिरौरी कर सकता है कि आप उसे या उन्हें किसी फिल्मी पार्टी में ले चलें। यदि आपकी थोड़ी-बहुत जान पहचान है तो आप किसी न किसी जुगाड़ से किसी फिल्म की प्रीमियर पार्टी या अवार्ड फंक्शन या उसके बाद की पार्टी के पास पैदा कर लेंगे। लेकिन माफ कीजिए, अपने ही दिमाग का दही मत बनाइए। भला ये भी कोई फिल्मी पार्टियां हैं।

आपसे पूछा जाए कि आप कैसे जानते हैं कि यही असली पार्टी है तो आप मुस्कराते हुए छपा हुआ निमंत्रण पत्र दिखा सकते हैं। लेकिन जनाब, आप हकीकत से कोसों दूर हैं।

बॉलीवुड की पार्टियों का रंग-ढंग पिछले इन कई सालों में बदल गया है। पार्टी तो राजकपूर साहब दिया करते थे। उनके चेम्बूर कॉटेज में जो भीड़ मचती थी कि पूछिए मत। वहां बेहतरीन स्कॉच उड़ेली जाती थी और साथ होते थे गर्मागरम कबाब। आरके स्टूडियों में जब होली का जलसा होता था तो वहां यह रिवाज था कि रंगों से भरे हौज में सबको डाला जाएगा। फिर भांग की आसमानी उड़ान को संभालते थे सितारा देवी के ठुमके। वो रंग जमता था कि उतरता नहीं था। राजकपूर की पार्टियों में मजाल कि कोई भी बड़ा-छोटा सितारा न आए। राजेंद्र कुमार, नरगिस, वैजयंतीमाला बाली से लेकर मुकेश सरीखे गायक तक सब आते थे। एक तरह से कहें तो पूरा बॉलीवुड होता था।

राजकपूर के बाद पार्टियों की कमान संभाली निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने। उनका जन्मदिन हो, पत्नी रेहाना का जन्मदिन हो, उनकी शादी की सालगिरह हो, नई फिल्म का मुहूर्त हो या फिर कोई नई फिल्म कामयाब हुई हो- शहर भर में इन पार्टियों की ही चर्चा होती थी। इसलिए नहीं कि उनमें फिल्मी सितारों का जमघट लगता था बल्कि इस बात के लिए कि कौन सा सितारा उस पार्टी में कितनी देर रहा। दूसरी तरफ सुभाष घई के रिश्ते पत्रकारों से भी हमेशा ठीक रहे हैं। इसलिए इस बात पर कोई ताज्जुब मत कीजिएगा कि कई पत्रकार भी उन महफिलों में शराब से ठिठोली के साथ-साथ सितारों से उनके इंटरव्यू के लिए झिकझिक भी कर रहे होते थे। राजकपूर के दिनों में तो केवल दो या तीन पत्रकार ही खुद को इतना करीबी पाते थे कि सिर्फ उनको ही उन खास पार्टियों में आमंत्रित किया जाता था। ये लोग मासिक फिल्मी पत्रिकाओं के संपादक हुआ करते थे या नामचीन समीक्षक जिनका उनसे रिश्ता बन जाता था। इस मामले में राजकपूर बड़े साफ थे कि वे उनको किसी कवरेज के लिए नहीं बुला रहे होते थे। यह तो दोस्तों की महफिल होती थी जिसमें वे सभी बिना कॉपी-कलम-रिकॉर्डर के आते थे।

सुभाष घई की पार्टियों में तो कई सितारों को यह खलता भी था कि यहां इतने श्रमजीवी पत्रकार क्या कर रहे हैं। उन्हें इन सबके सामने सिगरेट या शराब पीने में झिझक होती थी या फिर उन हसीन बालाओं से नैन-मटक्का करने में संकोच होता था जो शाम से ही उनके इर्द-गिर्द मंडरा रही होती थीं। घई की पत्रकारों से ये नजदीकियां सितारों को नागवार गुजरती थीं लेकिन वे शिकायत भी नहीं कर सकते थे। ऐसा बताया गया कि एक बार अक्षय खन्ना को घई की एक पार्टी में बड़ी कोफ्त हुई थी कि उसकी निजता में ये नामुराद बड़ा खलल डाल रहे थे। घई को पत्रकारों को मित्र बनाने और उनके साथ महफिल जमाने में बड़ा मजा आता था। बाद में जो कुछ छपता था, उसे भी वे भरपूर मजे से शेयर करते थे। शोमैन का टैग भी तो यूं ही मिला था उन्हें।
लेकिन अब तो यही कहने लगे हैं लोग कि जाने कहां गए वो दिन। सितारों व पत्रकारों की जुगलबंदी अब बीते दिनों की बात हो गई है। पार्टियां तो अभी भी होती हैं जहां पत्रकारों को बुलाया जाता है लेकिन वे वही हैं जहां सब कुछ शालीन होता है। हंसना भी हो तो तौल के। यहां बड़े सितारे नाप-तौल के 20 मिनट से अधिक नहीं रुकते और कैमरे व कलम की भूख मिटाने के लिए कुछ बोलते हैं फिर निकल लेते हैं। खाने-पीने की तो बात ही छोड़िए।

यदि आपका परिचित या मित्र ऐसी ही किसी पार्टी का निमंत्रण देता है तो बस मुस्कराइए। असली बॉलीवुड पार्टी में तो कमाल का धमाल होता है। आम तौर पर यह किसी सुपरस्टार ने आयोजित की होती है। इसमें निमंत्रण पत्र नहीं छपवाए जाते बल्कि जिन्हें बुलाया जाना होता है उन्हें या तो सुपरस्टार खुद या उसकी पत्नी फोन करती है (एसएमएस भी नहीं भेजा जाता, समझ जाइए)। मीडिया को बुलाने की गलती कोई नहीं करता। पार्टी स्थल के बाहर खड़े बाउंसर्स तक यह जानते हैं कि किसे जाने देना है और किसे नहीं।

हां, वहां अपनी शानदार गाड़ियों में आते सितारों की तस्वीरें और कुछ मसालेदार बातें छपी हुई जरूर दिख जाती हैं। अब आप जानना चाहेंगे कि ये कैसे होता है? ऐसा इसलिए कि स्टार महोदय का पीआर बंदा किसी एक फोटोग्राफर के कान में फूंक देता है। बस इतना ही काफी है औरों के लिए। लिहाजा जब तक हस्तियां आनी शुरू होती हैं, तब तक कैमरे तैनात हो जाते हैं और उनकी आमद होते ही फ्लैश चमकने लगते हैं। लेकिन इसमें भी अच्छा चकरम है। कोई भी सितारा कलम या कैमरे को अंदर तो आने नहीं देना चाहता लेकिन इस बात के लिए भी खुजली होती रहती है कि पेज-3 पर उनका नाम-वाम है कि नहीं। आज की फिल्मी पार्टियों में कुछ एक सिर कुछ दूरी पर एक साथ दिखाई देते हैं। सहूलियत के हिसाब से दोस्तों के गुट चूं-चां शुरू करते हैं। होस्ट महोदय, उनकी पत्नी और उनके कुछ सखा-सखी बारी-बारी से हर गुट के पास जाते हैं और उनकी खैर-खबर लेते हैं कि मजा आ रहा है कि नहीं। जब केक कटने की बारी आती है तो सबको उठकर वहां तक आना पड़ता है और वहां बड़ा मजा आता है। प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने होते हैं, पूर्व प्रेमिकाएं व प्रेमी जो अभी तक एक दूसरे से आंखें बचा रहे होते हैं, करीब आ जाते हैं। यही वो समय है जब पैसा वसूल हरकतें होती हैं। प्रतिद्वंद्वी कलाकार ऐसे मिलते हैं मानो कुंभ के मेले में बिछड़ने के बाद आज ही मिले हों। एक दूसरे की पीठ थपथपाते हैं और वो सब कुछ कहते हैं जिसका न सिर होता है न पैर क्योंकि ठीक दस मिनट बाद दोनों को याद नहीं रहेगा कि उन्होंने क्या कहा था। पूर्व प्रेमी-प्रेमिकाएं गले मिलते हैं, एक मीटर तक फैली मुस्कान देते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि सब उन्हें ही देख रहे हैं। आडम्बर यहां चरम पर होता है। अलबत्ता यदि सलमान खान को निमंत्रित किया गया है तो एकाध पैग के बाद आप उन्हें रिंग में उतरा हुआ देख सकते हैं।

हाल ही में किसी बड़े स्टार की बर्थडे पार्टी में, जो मुम्बई के सबसे चर्चित नाइट क्लब में हुई थी, अंदर के किसी आदमी ने बताया कि किसी नौजवान निर्माता की पत्नी को जो उम्मीद से थीं, 20 मिनट बाद ही वहां से चले जाना पड़ा। हर कोने से आ रही गंध को हर कोई थोड़े ही ङोल सकता है। उसी पार्टी में एक मंझोले स्तर के सितारे ने अपनी नई डुकाटी मोटरबाइक पर सबको घुमाने की जिद कर अलग ही समां बांधा था।

अफवाहें तो यह हैं कि एक नामचीन सितारे की पत्नी, जिन्हें अपने पति के दोस्तों को पार्टी देने में बड़ा सुख मिलता है, अपने घर पर होने वाली पार्टी में एक खास किस्म की आनंदप्रदायी गोलियों का डिब्बा सबके सामने रख देती हैं कि खाओ और आनंद में डूब जाओ। अधिकांश पार्टियों में ऐसा इंतजाम होता है किन्तु कुछ खास लोगों के लिए लेकिन आप यदि मिस्टर बिग शॉट के घर पर हैं तो वहां का चलन है कि वहां सबकुछ बहुत अधिक मात्र में उपलब्ध होता है। ऐसा नहीं है कि खाने की चर्चा नहीं होती। सितारों की बीवियां इसी काम के लिए तो हैं लेकिन श्रीमान सितारे जी तब तक जाम थामे बैठे रहते हैं जब तक उनके अपनी कार में बैठने का समय न आ जाए। अधिकांश सितारे अपनी पत्नियों की प्लेट में से ही खा लेते हैं। अरे संगीत की बात तो रह ही गई। पार्टियों में तो वही संगीत बजता है जो होस्ट के बिग हिट्स होते हैं और मामला तब तक नहीं रुकता जब तक सभी डांस फ्लोर तक न आ जाएं। कई बार तो कुछ दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं बाथरूम में जब अतिथि लोग जरूरत से ज्यादा ले लेते हैं। लोग तो इतना ले लेते हैं कि खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है। रेस्टरूम किसी सराय से कम नहीं लगता। एक बार तो उस वक्त का सीन देखने लायक हो गया था जब किसी ने मूत्रालय में न चाहते हुए भी दूसरे के महंगे जूते पर सूसू कर दिया था। बाद में बड़ा हंगामा हुआ था।

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