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शिक्षा के अधिकार पर थोड़ा सा रूमानी हो जाएं

इस अनादर्श, अमौलिक और छलना भरे निहायत गैर-रूमानी युग में रूमान इसी तरह लौटता है। अचानक आपको ‘नवजागरण’ (रेनेंसाँ) के किसी एक हुलास भरे पल में ले जाता है और फुसफुसाकर पूछता है- समकालीन स्वप्नहीनता में क्या अब भी कुछ सपने सच होने शेष हैं? ज्ञानक्रांति के स्वप्न क्या इस ‘बे-सच’ समय में सच हो सकते हैं? क्या कोई किसी न देखे गए सपने में जा सकता है? इस खातिर ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाए’ तो क्या अपराध है?

अचानक कवि त्रिलोचन की कविता याद आती है। ‘चंपा काले अक्षर नहीं चीन्हती’ की चंपा आंखों के आगे थिरक उठती है। सियारामशरण गुप्त की ‘सुखिया’ नाचने लगती है। ‘मदन घर चल’ वाले पाठ में बचपन में बंद कर दिया गया मदन कबड्डी खेलने लगता है। पढ़ने का सपना उड़ान भरता है।

बचपन की वह पट्टी जिसे गेरू से पोतकर-सुखाकर, उसे घोटे से चमकाकर, साथ में खड़िया का एक बुद्दका लेकर, दो तनियोंवाले झोले में नेजे की बनाई डय़ोढ़ी लिखाई करने वाली कलम और बाल-पोथी डाल जब दूसरे दोस्तों के साथ पट्टी लड़ाते-बचाते स्कूल पहुंचते थे तो शिक्षा क्रीड़ा की तरह आती थी। अहसास होता था कि पढ़ने से कुछ होता है।

‘अ आ ई ई’ को घोट-घोटकर धीरे-धीरे पांचवी दसवीं-बारहवीं की ओर लुढ़कते-सरकते तब कब याद आता कि जो हम कर रहे हैं उससे अपना ‘कुछ होना’ भी जुड़ा है? बस इतना महूसस होता कि पढ़ना अपने आप में एक कीमती काम है। जो स्कूल नहीं जाते थे उनसे कुछ अलग हो रहे हैं हम! इसी का मजा था।

जो अभागे नहीं पढ़ सकते थे, जिनकी संख्या अनंत थी और आज भी है, हम नहीं सोच पाते कि उनके मन की आखों में क्या वैसा सपना न होगा जो हमारी आंखों में है? पढ़ने का निराला आनंद, कुछ नया करने, नई दुनिया के ज्ञान की जोत जगने का आंनद क्या उनके पास होता था? गरीबी आदमी को ज्ञान की रेखा के किस कदर नीचे दफन करती है, यह दर्द गरीबी की रेखा के नीचे रहने के दर्द को किस कदर स्थायी बना डालता है। यह वही जानता है जो पीछे रह गया है या अधकचरे विकास ने जिसे वहां तक आने नही दिया।

यह लेखक कुछ देर भावुक रहना चाहता है। भावुक हुए बिना कोई क्या खाक रूमानी होगा। गैर रूमानी से दिखने वाले मनमोहन सिंह ने उस शाम कुछ ऐसा बोल दिया जिसे सुन कर मन में कहीं कोई सिसक उठा। मनमोहन ने कहा कि ‘वे मीलों पैदल चलकर स्कूल जाते थे ओर दिये की रोश्नी में पढ़ते थे और आज वे जो कुछ हैं शिक्षा की बदौलत हैं’।

उनकी ऐसी बातों ने दिल को छू लिया।‘काले अक्षर’ न चीन्ह पाने वाली करोड़ों चंपाए, कमलाएं, मदन, रमन, तीसरी चौथी जमात के बाद ढोर चराते, लकड़ी बीनते, दूसरे घरों का काम करते, कूड़े से प्लास्टिक पन्नी बीनते अब भी मौजूद हैं। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने वाले सबको अनिवार्य करने वाले इस कानून के लागू होने के दस बीस साल बाद का नक्शा सोचें तो एक दिन जब काले आखर न केवल चीन्हेंगी बल्कि पढ़ाएंगी भी तब ज्ञान क्रांति होगी। तब हिंदुस्तान वह न रहेगा जो है।

मनमोहन सिंह देश के पीएम हैं। उनके विरोध में बोलना, उनकी नीतियों के दोष निकालना, रोज ब रोज होता रहता है। यह लेखक भी करता रहता है। सोनिया यूपीए की अध्यक्ष हैं और ‘सब को शिक्षा का अधिकार’ सोनिया जी का सपना रहा है। उनके आलोचक अनंत हैं। हिंदी के एक मामूली लेखक और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अदना प्रोफेसर द्वारा उन्हें उनके किए के किसी भले संदर्भ में याद करना उनकी चमचागीरी कहला सकता है।

लेकिन इस जोखिम के बावजूद यह कहा जाना चाहिए कि शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर यूपीए और मनमोहन ने एक शांत-क्रांति की रचना कर दी है। सोचना चाहिए कि जब अपने मुल्क में सब न्यूनतम दसवीं बारहवीं तक पढ़े होंगे तब क्या सीन बनेगा? उस विराट साक्षर और ज्ञानवान जगत में साहित्य संगीत कला विज्ञान समाजविज्ञान और उत्पादकता का वातावरण होगा। हर ओर विचार होंगे, अपने अपने मत होंगे, बहसें होंगी। इस अभियान में हिंदी बढ़ेगी। हिंदी समाज अपने पिछड़ेपन से बाहर निकलेगा। आइए, थोड़ा-सा रूमानी हो जाए!

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