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मेरा कोई निजी एजेंडा नहीं है

केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्री अपने मंत्रालय के काम-काज के अलावा बाकी कई मामलों में टिप्पणियों को लेकर काफी चर्चा में हैं। उन्होंने पर्यावरण के मुद्दों पर कोई समझौता न करके सरकार के भीतर बाहर कई लोगों को नाराज कर रखा है। भोपाल में एक दीक्षांत समारोह में शुक्रवार को कन्वोकेशन गाउन को गर्मी की वजह से उतार फेंकने को भी पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदना से जोड़ कर देखा जा रहा है। उनके मंत्रालय से जुड़े विवादों पर जयराम रमेश से रूबरू हुए उमाकांत लखेड़ा

राष्ट्रीय राजमार्गो की कुछ अहम सड़कों को हरी झंडी देने के मामले में मंत्रालय रोड़ा अपना रहा है। ऐसे में पिछड़े क्षेत्रों का विकास कैसे होगा?
हमारा मंत्रालय सड़कों के विकस में कहीं बाधक नहीं है। 95 प्रतिशत मामलों में हम अनुमति दे रहे हैं लेकिन जिन अंचलों में सड़कों के आवागमन से जंगलों के अंधाधुंध कटान की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है वहां हम कोई समझौता नहीं करेंगे।

आपकी सरकार उच्च आर्थिक वृद्धि दर की ओर  देश को ले जाने की बातें कर रही है। पर्यावरण और विकास एक साथ आगे नहीं गढ़ेगा तो कैसे बात बनेगी?
समग्र विकास में ये बातें भी शामिल हैं कि पर्यावरण की कीमत पर विकास की बातों के कोई मायने नहीं हैं। मैं इस बात का पक्का पक्षधर हूं कि विकास का भी पर्यावरण संतुलन से कम महत्व नहीं है।

छिंदवाड़ा में एक जंगल के क्षेत्र से सड़क लेजाने को लेकर आपके और केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के बीच जंग छिड़ी हुई है। केन्द्र के दो मंत्री इस तरह क्यों भिड़ रहे हैं?
जिस मामले की आप चर्चा कर रहे हैं, उस पर मैं ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहता। सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि मेरा कोई निजी एजेंडा नहीं है। पर्यावरण से जुड़े नियम सब जगह लागू होंगे। पर्यावरण व वन की क्लियरेंस पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 तथा वन संरक्षण अधिनियम 1980 के आधार पर पूरे देश में लागू होती है। इसी तरह वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन कानून 1972 बना है। मेरा मंत्रालय इन कानूनों का मन वचन से लागू करने को प्रतिबद्ध है। इस मामले में पूरी पारदर्शिता से काम हो रहा है। मेरा कोई निजी एजेंडा नहीं है।

उत्तराखंड सरकार ने भी बांध परियोजनाओं को रोकने का विरोध किया है। राज्य के मुख्यमंत्री ने मांग की है कि हमें बिजली पैदा करने से रोका गया तो क्षतिपूर्ति हो ?
उत्तराखंड में कोई पावर प्रोजेक्ट बंद नहीं कर रहे हैं। वहां की बिजली की जरूरतों को हम दूसरी जगहों/विकल्पों से पूरा करेंगे। पूरे हिमालय क्षेत्र में अगर प्रस्तावित बांधों को बनने की इजाजत दे दी जाएगी तो इससे पूरे हिमालय का संरक्षण और वहां के जन-जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

उत्तराखंड जैसे पिछड़े प्रदेश में ऐसा करने से रोजगार के अवसर भी प्रभावित नहीं होंगे?
हम रोजगार के मामलों की भी क्षतिपूर्ति को तैयार हैं। हम राज्य सरकार से इन मुद्दे पर बात करेंगे।

जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार संबंधी कानून संसद ने पारित किया। वह सही ढंग से लागू क्यों नहीं हुआ?
यह राज्य सरकारों का काम है कि वह संसद द्वारा बनाए गए कानून को लागू करें। मेरा मंत्रालय इसमें कहीं भी बाधक नहीं है। हम राज्य सरकारों से इस कानून को लागू करवाने के लिए अपनी ओर जो कुछ कर सकते हैं, कर रहे हैं।

लुप्त हो रहे या घट रहे जंगली जीव जंतुओं को पालने पोसने की अनुमति जंगलों में रहने वाले लोगों को क्यों नहीं दी जाती, क्या इससे मानव और जंगली जानवरों के बीच नया रिश्ता नहीं बनेगा?
यह मुमकिन नहीं है कि जंगली जानवरों को पालना गैरकानूनी है। हम ऐसा नहीं होने देंगे कि लोगों को जंगलों से जानवर पकड़ कर पालने की अनुमति दी जाए। ऐसा हुआ तो वन्य जीवन संरक्षण कानून का मजाक बन जायेगा। बड़ी संख्या में जंगली जानवरों की प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। मनुष्य ही काफी हद तक उनके विलुप्त होने के लिए जिम्मेदार है।

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