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कसाब और हेडली के गुनाह कबूलने के बाद

आखिर मुंबई में 26 नवंबर 2008 को जो भी हुआ था, उसके पीछे की साजिश क्या थी? मुंबई में कसाब और शिकागो में हेडली के गुनाह कबूल लेने बाद तसवीर कुछ साफ हो गई है। उस हमले में 160 मासूमों की जान चली गई थी। उसमें हिंदुस्तानी थे और विदेशी भी। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई वगैरह थे। आदमी, औरत और बच्चे थे। हाल ही के वक्त में ऐसा हमला देखा ही नहीं गया था।
 
अब हम कसाब को उसके जुर्म के लिए फांसी दे सकते हैं। हेडली ने अपना गुनाह मान कर अमेरिकी क्रिमिनल लॉ के मुताबिक इलेक्ट्रिक चेयर से खुद को बचा लिया है। लेकिन उन लोगों का क्या जो पाकिस्तान में छुट्टे घूम रहे हैं? क्या पाकिस्तान के हुक्मरानों में इतना माद्दा है कि अपने देश में अपराध करने वालों को सजा दे सकें? ये ही वे लोग हैं, जो हिंदुस्तान के खिलाफ जेहाद छेड़े हुए हैं। मुझे तो नहीं लगता कि वे कुछ करेंगे। वे तो अब तक जुनूनी मुल्ला हाफिज सईद को जेल में नहीं डाल सके हैं।
 
असल में हिंदुस्तान के खिलाफ लगातार जहर उगला जा रहा है। उसकी वजह से उनका अवाम तालिबानी दिमाग से सहमत होने लगा है। उन्हें लगता है कि हिंदुस्तान को सबक सिखाने की जरूरत है। कश्मीर की ओर इशारा कर वे अपने अवाम को गुमराह करते रहते हैं। वे यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि कश्मीर में हमारी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार है, जिसे उमर अब्दुल्ला चला रहे हैं। वहां मजबूरन हमें सेना लगानी पड़ी है। ताकि पाकिस्तान से लगातार आ रहे हथियारबंद घुसपैठियों को रोका जा सके। अगर यह घुसपैठ रुक जाए, तो हम वहां से सेना हटा सकते हैं।

हम पर एक आरोप पाकिस्तान के हुक्मरान लगाते हैं। उनका मानना है कि बलूचों की अलग देश बनाने की मांग के पीछे हिंदुस्तान है। गवाही के तौर पर वे कहते हैं कि बलूच की आजादी के दीवानों के पास तमाम हथियार हिंदुस्तान में बने होते हैं। लेकिन हिंदुस्तान में बने हथियार तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविन्स में खुल कर मिलते हैं।

ये सब हिंदुस्तान से नहीं जाता। यह तो नेपाल के जरिए वहां तक पहुंचता है। फिर वहां जो हथियार मिलते हैं उसमें अमेरिका, चीन और रूस के भी होते हैं। ऐसे में हिंदुस्तान को अकेले कोसना ठीक नहीं है। ऐसे आरोपों की कोई बुनियाद नहीं है। अब हिंदुस्तान के लिए जरूरी है कि दूसरे देशों को सहमत कर पाकिस्तान पर दबाव बनाएं, ताकि मुंबई हमले की साजिश करने वालों को सजा मिल सके।

मुगलों के हरम
आप उसे एकतरफा ही कह सकते हैं। आखिर वह आदमियों की दुनिया थी। औरत तो वहां महज खिलौना थी। खुशी, सेक्स और बच्चे पाने का जीता-जागता खिलौना। उस दौर में हरम एक किस्म का स्टेटस सिंबल था। माना जाता है कि अकबर के हरम में एक हजार से ऊपर औरतें थीं। मुसलमान, हिंदू, ईसाई, अरब, तुर्क और काली-गोरी सभी किस्म की औरतें वहां थीं। उन्हें एक अलग जगह पर रखा जाता था। उनकी देखभाल के लिए हिजड़ों की टुकड़ी होती थी। और जब तक बादशाह की इजाजत न हो, उन्हें बाहर नहीं जाने दिया जाता था।

वह उनके साथ शाम बिताने आते थे। शराब पीते थे। नाच-गाना देखते थे। और एक-दो के साथ सेक्स करते थे। उससे ज्यादा शायद उनके बस में नहीं था। चाहे जितनी कामोत्तेजक दवाएं खा लें। उनकी औरतें कुंठाओं में जीने लगती थीं। उससे पार पाने के लिए उन्होंने अपने तरीके निकाल लिए थे। समलैंगिक संबंधों का बाजार गर्म रहता था। बुरके में लड़के लाए जाते थे। शाही परिवार की अलग-थलग औरतें भी इसी तरह अपनी भूख मिटाती थीं।
 
मुगल बादशाहों ने अपनी सेक्स हरकतों पर लिखा ही नहीं है। हां, मुगलिया सल्तनत के संस्थापक बाबर ने जरूर माना था कि उसे बेगमों से ज्यादा लड़के मजा देते थे। आखिर इतनी जबर्दस्त पाबंदियों के होते हरम के किस्से कैसे बाहर आते? वहां से नौकर चाकर और हिजड़े बाजार तक जाते थे। बाजार किस्सों से भरा रहता था।

अपने संस्मरणों में टैवर्नियर और मानुची ने कुछ इशारा किया है। लेकिन हरम पर कायदे का काम हाल की घटना है। सईद मुबीन जेहरा ने इस सिलसिले में पीएचडी और एमफिल की है। बॉम्बे यूनिवर्सिटी से एमफिल है ‘मुगल: फैमिली ऐंड हाउसहोल्ड।’ और जेएनयू से डॉक्टरेट है ‘सेक्सुअल ऐंड जेंडर रिप्रेजेंटेशन इन मुगल इंडिया।’ कमाल का काम है यह।

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