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डरो, लेकिन बह मत जाओ

अपने विषय का वह अच्छा जानकार था। उसकी तैयारी बेहतरीन थी। प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी उसने अच्छी-खासी बना ली थी। लेकिन कॉन्फ्रेंस हॉल में पहुंच कर वह अपनी बात ही नहीं कह सका। अपनी रिपोर्ट को भी प्रोजेक्ट नहीं कर पाया। न जाने उसे वहां क्या हो गया था?
 
कनाडा के ओटावा की कार्लटन यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के एशोसिएट प्रोफेसर डॉ. तिमूती पैचिल का कहना है कि हमारे कुछ डर होते हैं। वह हमें अपना बेहतरीन देने से रोकते हैं। उन डरों को जाने-समझे बगैर कामयाबी का रास्ता नहीं दिखता। हमारे भीतर कुछ नकारात्मक भावनाएं होती हैं। वे गाहे-बगाहे ऊपरी सतह पर आ जाती हैं। इन्हीं में डर बेहद अहम है। डर एक बार हावी हुआ, तो हमारे भीतर जो भी सकारात्मक होता है, वह वह उभर नहीं पाता।

उसका सबसे खराब हिस्सा यह होता है कि हम जो जानते हैं, उसे भी सामने नहीं ला पाते। आमतौर पर इंटरव्यू या प्रोजेक्ट रिपोर्ट पेश करने के दौरान इसी किस्म के डर उम्मीदवार को बर्बाद कर डालते हैं। यही डर अच्छे-खासे खिलाड़ी को वक्त पर अपना बेहतरीन प्रदर्शन नहीं करने देते।
 
डॉ. तिमूती इन डरों को समुद्र की लहरों की तरह मानते हैं। वे आती हैं और आपको बहा कर ले जाती हैं। आपके भीतर एक हलचल होती है। आप नकारात्मक भावनाओं में डूबने लगते हैं। लेकिन इनसे लड़ने के लिए हमारे ही भीतर सकारात्मक भावनाएं भी होती हैं। अगर उन पर हम पूरी तरह भरोसा करें, तो नकारात्मक भावनाओं की लहरें हमारे ऊपर-ऊपर से निकल जाती हैं। बाद में वही सकारात्मक भावनाएं एक अलग किस्म की लहरें बनाती हैं। वे भी हमें बहा कर ले जाती हैं। लेकिन वे हमें अपनी मंजिल तक पहुंचाती हैं। हमें इधर-उधर भटकाती नहीं हैं।

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