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पाकिस्तान में बवंडर

पाकिस्तान की राजनीतिक स्थितियां तेजी से करवट ले रही हैं। अगले दो तीन महीनों में वहां क्या होगा, इसके बारे में महज अनुमान लगाया जा सकता है। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी चारों तरफ से घिर चुके हैं। इसका प्रमाण यह है कि जरदारी ने अपनी शक्तियां सीमित करने का खुद ही समर्थन कर दिया है। अगर राष्ट्रीय असेंबली में पेश किया गया 18 वां संविधान संशोधन पास हो गया तो वहां राष्ट्रपति की शक्तियां नाममात्र की रह जाएंगी।

इस संशोधन के बाद वह न तो प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर सकेगा न ही संसद को भंग कर पाएगा। न ही सेना प्रमुखों की नियुक्ति कर सकेगा। अब किसी राजनेता के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने पर पाबंदी नहीं रहेगी। असेंबली के दो तिहाई बहुमत के बिना कोई भी कानून पास नहीं हो सकेगा। अगर हम वहां हो रहे इस परिवर्तन को महज संवैधानिक विशेषज्ञों और राष्ट्रीय असेंबली के माहौल के लिहाज से देखेंगे तो लगेगा कि लोकतंत्र के हित में महान क्रांतिकारी परिवर्तन होने जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान करीब 30 साल बाद अपनी संसद को संप्रभुता देने और तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बहाल करने का साहस जुटा पाया है और उसका संविधान सही मायने में जनता के चुने प्रतिनिधियों के हाथों से आकार ग्रहण कर रहा है।
  
प्रस्तावित संशोधन के बाद पाकिस्तान का संविधान 1973 वाली उस स्थिति में पहुंच जाएगा जिसके बाद इस देश ने तमाम सैनिक तानाशाहों को अपने हाथों में शक्तियां समेटते देखा है। क्या पाकिस्तान ज्यादा लोकतांत्रिक होने की दिशा में बढ़ रहा है या फिर वहां सैनिक शासन का खतरा मंडरा रहा है? दरअसल पाकिस्तान में लाए जा रहे इस संशोधन के वास्तविक असर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से काटकर महज कानूनी नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

राष्ट्रपति जरदारी लगातार कमजोर हुए हैं और सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक कयानी ताकतवर हुए हैं। उन्होंने जरदारी की ताकत घटाने के लिए कभी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी का इस्तेमाल किया, कभी प्रधानमंत्री गिलानी तो कभी अमेरिका का। यह महज संयोग नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति जरदारी की उन्मुक्तता को दरकिनार कर नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो से उनके काले धन के मामलों की जांच करने की बात कर रहा है और दूसरी तरफ नेशनल रिकान्सिलिएशन आर्डिनेंस के मामलों को भी आक्रामकता के साथ उठा रहा है।

हाल में अमेरिका से हुई रणनीतिक वार्ता में जरदारी को पूछा तक नहीं गया और कयानी सारे संवाद करते रहे। संशोधन से फायदा होते देख पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी इसके पक्ष में आ गए हैं और इसी के साथ जरदारी की पार्टी और उनके साथ उनका सत्ता संघर्ष तेज होता जा रहा है। इस सत्ता संघर्ष में जरदारी कितना टिकेंगे और कितना समर्पण करेंगे यह तो समय ही बताएगा, लेकिन पूरे देश में फैली जरदारी की पार्टी इतनी आसानी से हार मानेगी लगता नहीं। दूसरी तरफ महंगाई, मंदी और बिजली की भारी कमी के चलते पाकिस्तान के शहरों में लगातार प्रदर्शनों के मार्फत जनता का असंतोष व्यक्त हो रहा हैं। लेकिन इस लोकतांत्रिक खेल के पीछे पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन का जो वबंडर उठ रहा है, उसके संकेत अच्छे नहीं हैं, जो भारत के लिए भी ठीक नहीं है।

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