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टिकट नहीं देंगे, आरक्षण दे देंगे

हम लोगों में आदर्शवाद एवं यथार्थवाद का कितना द्वंद्व है, यह गाहे-बगाहे प्रकट होता ही रहता है ओर इसी की एक बानगी दिख रही है- महिला आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर। स्वतंत्र भारत में आज तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने किसी भी चुनाव पर 33 फीसदी महिला उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया परंतु आज महिलाओं की सहानुभूति हासिल करने के लिए विधेयक पर ये कमर कसे हैं। ये वही लोग हैं जो फिल्मों में हीरो-हीरोइनों के मिलन पर तालियां पीटते हैं और अपने गली-मुहल्ले में ऐसी किसी रोमांटिक जोड़ी की भरपूर मरम्मत करते हैं। महिला आरक्षण विधेयक पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की जुगलबंदी यही साबित करती है कि ‘वैसे तो हम अपनी पार्टी में 33 क्या 13 फीसदी टिकट भी महिलाओं को नहीं देंगे, हां यदि कानून बन जाए तो मजबूरी में देना पड़ेगा ही।’ इसी के साथ इस विधेयक ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि बिना आरक्षण की बैसाखी के हमारे देश में कोई भी ठोस काम मुश्किल है।
विनोद कुमार शुक्ला, सी-313, नेहरू विहार (तिमारपुर), दिल्ली

अर्थ आवर और पर्यावरण
27 मार्च को दुनिया भर के 4000 शहरों और कस्बों में अर्थ आवर मनाया गया जिसमें हमारा देश भी शामिल था। इस अर्थ आवर अभियान में शाम को एक घंटे बिजली बंद की गई। यह आज के समय जहां पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिग और पर्यावरण संकट से जूझ रहा है वहां अर्थ आवर जैसे अभियान का महत्व और बढ़ जाता है। अगर पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिग को बचाना है तो हमें ऐसे वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत को बढ़ावा देना चाहिए जिससे कि बिजली की कम खपत हो और इसके लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्नोतों को अपनाया जा सकता है। पर्यावरण को बचाया जा सकता है।
अरविन्द कुमार, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली

अंधविश्वास का आसरा
फिल्मों-कहानियों में इच्छाधारी नाग-नागिनों के दृश्य-किस्से तो देखे-सुने थे लेकिन इच्छाधारी बाबा पहली बार प्रकाश में आया है। हो सकता है कल को कोई इच्छाधारी संत, महंत, मौलवी व पादरी भी मुख्यात या सुविख्यात हो जाए। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। क्योंकि इस वैज्ञानिक युग में भी जिस अंधविश्वास प्रधान देश या राज्य के लोग अंधविश्वास के कीचड़ में गले-गले तक डूबे-फंसे हों और जहां घोर अंधविश्वास का माहौल इच्छाधारी बाबाओं, ज्योतिषियों, तांत्रिकों, वास्तुशास्त्रियों तथा पाखंडी पंडों के अनुकूल हो तो, वह ये सब अंधविश्वास के पुजारी इच्छाधारी, अंधविश्वासी लोगों को अपने-अपने तरीकों से ठगने-लूटने और आर्थिक, मानसिक व यौन शोषण करके चील-गिद्धों की तरह नोचने में भला कैसे पीछे रहेंगे।
बी. एस. डोगरा, सीमापुरी, दिल्ली

जल ही जीवन है
जल कितना बहुमूल्य है इसकी कीमत आज उनहें नहीं समझ में आती जो इसका दुरुपयोग करते हैं। मगर इसकी कीमत का अंदाजा उन्हें जब लगेगा जब वो इसके लिए तरसेंगे, क्योंकि इसका दुरुपयोग करने वालों को यह नहीं पता कि हम बिना खाए तो कुछ दिन जीवित रह लेंगे पर बिना जल के नहीं। इस प्रकृति की अनमोल धरोहर को बचाने में जरा भी लापरवाही न बरती जाए, एक-एक बूंद जल बहुमूल्य है, कीमती है। जरूरत के हिसाब से ही इस्तेमाल करें क्योंकि जल ही जीवन है।
विकास उर्फ धीरज, आर-सी/261, गली नं.-4, खोड़ा कालोनी

समय का महत्व सीखें
आज हर आदमी अमेरिका, जापान, रूस, कोरिया, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया आदि देशों की तरफ रुख कर रहा है। मशीनी जिन्दगी की चकाचौंध उन्हें आकर्षित कर रही है, लेकिन उन्हें यह याद नहीं रहता कि वहां भी वही काम करना पड़ेगा जो यहां करते हैं। बस फर्क इतना है कि वहां समय का महत्व समझा जाता है जो हम नहीं समझते। इसका उदाहरण है जापान की एक कंपनी ने घोषणा की कि हर कर्मचारी को हफ्ते में एक छुट्टी लेनी जरूरी है। छुट्टी नहीं लेने पर जुर्माना लगाया जाएगा। अगर हम विदेश जाकर  समय का महत्व सीख लें तो हमारी स्थिति उनसे काफी बेहतर हो सकती है।
दिनेश कुमार मेरूठा, हरिद्वार

सबकी पढ़ाई हो समान
शिक्षा का अधिकार सारे बच्चों को स्कूल भेज पाएगा अभी तो इसमें ही शक है। बाल मजदूरी निवारण कानून बनाने वाली संसद के थोड़ी दूर ही रेड लाइट पर बच्चे अखबार पत्रिकाएं बेचते देखे जा सकते हैं। दूर दराज के गांवों में तो पता नहीं क्या हाल होगा। लगता है कुछ ऐसा ही हश्र शिक्षा के अधिकार वाले कानून का भी होगा। और अगर सब बच्चों को भेज भी दिया गया तो सरकार स्कूलों, या गांव देहात के स्कूलों की आज जो हालत है उसके चलते जो बच्चे वहां से निकलेंगे वे अनपढ़ भले ही न हों लेकिन उन्हें शायद पढ़ा लिखा भी नहीं कहा जा सकेगा। सुविधाओं के अभाव में हुई ऐसी पढ़ाई का क्या अर्थ है जिसका जीवन में कोई इस्तेमाल न हो सके। इसलिए सारी सुविधाओं के साथ शिक्षा के अधिकार की बात होनी चाहिए। जरूरी है कि देश सभी बच्चों की शिक्षा एक समान हो।
राजेश विप्लव, सैक्टर-4, वैशाली, गाजियाबाद

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