DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यीशु आज भी जीवन की आशा

आज हम एक न रुकने वाली दौड़ में शामिल है, हर तरफ बेरुखी, निराशा, हताशा, चिंता व मातम है। यीशु ने कहा है- ‘तुम पृथ्वी के नमक हो, परंतु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए तो वह किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? वह किसी काम का नहीं केवल इसके कि बाहर फेंका जाए।’ आज मनुष्य अपना प्रेम व आत्मीयता खो चुका है, सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए जीवन को ईर्ष्या, क्लेश, बैर, द्वेष और शत्रुता का अखाड़ा बना, अपना अस्तित्व खो चुका व चिंता का ठेकेदार बन बैठा, जिसका नतीजा यह हुआ आपसी प्यार व सौहार्द की जगह चिंता और अकेलेपन ने ले ली।

यीशु की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण आज्ञा है- ‘अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करें।’ चिंता के विषय में प्रभु यीशु कहते हैं, ‘इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि अपने प्राण के लिए चिंता न करना कि हम क्या खाएंगे और क्या पिएंगे, न शरीर के लिए कि क्या पहनेंगे- क्या प्राण भोजन से और शरीर से बढ़कर नहीं?

परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में रचा और उसे पृथ्वी पर अधिकार दिया परंतु अपनी-अपनी इच्छाओं, लोभ और अहंकार के द्वारा मनुष्य ने परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन कर पृथ्वी को नष्ट कर दिया। इन परिस्थितियों से बाहर निकलने के लिए प्रभु यीशु ने धन्य वचन जो लूका 6:20-23 में वर्णित है, इस प्रकार है- मनुष्य मन के दीन बने, नम्र रहे, दयावंत हो, मन से शुद्ध रहे, मेल कराने वाले हो और सर्वप्रमुख एक-दूसरे से प्रेम रखे। दरअसल परमेश्वर को प्राप्त कर शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने का यही मूलमंत्र है।

आज चारों ओर आतंक, हत्या, उत्पीड़न व मातम होता नजर आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अधर्म-धर्म पर विजयी हो रहा है, अंधेरा बढ़ता जा रहा है, भ्रष्टाचार का बोलबाला है और शैतानी ताकतों का शिकंजा कसता जा रहा है। ऐसी बातें संप्रदायों या देशों के बीच में घटित हों, ऐसा नही है। ये घटनाएं सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक या फिर प्रशासनिक हर स्तर पर हो रही हैं। भाई-भाई के खून का प्यासा हो जाता है और ईर्ष्या, घृणा, जाति व वर्ग में भेदभाव, प्रतिशोध की भावना है, लोग एक-दूसरे को क्षमा नहीं कर पा रहे और शैतानी आज्ञा का पालन किया जा रहा है।

बाइबल में हबक्कूक भी कुछ ऐसा ही प्रश्न करता है। हबक्कूक 1:2-4 में वह परमेश्वर से कहता है कि- हे यहोवा मैं तब तक तेरी दुहाई देता रहूंगा और तू न सुनेगा? मैं कब तक तेरे सम्मुख ‘उपद्रव-उपद्रव’ चिल्लाता रहूंगा? क्या तू उद्धार न करेगा? तू मुझे अनर्थ के काम क्यों दिखाता है? और क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है? मेरे सामने लूटपाट और उपद्रव होते रहते हैं; और झगड़ा हुआ करता है और वाद-विवाद बढ़ता जाता है। इसलिए व्यवस्था ढीली हो गई है और न्याय कभी प्रगट नहीं होता। दुष्ट लोग धर्मी को घेर लेते हैं; सो न्याय का खून हो रहा है!

इस संसार में वर्तमान में हर विश्वासी को एक मानसिक संघर्ष और दबाव से गुजरना पड़ता है। हमें सिर्फ यीशु मसीह के पुनरुत्थान को स्मरण रखना है कि किस प्रकार संसार की सारी ताकतें नाकाम हो गईं। यहां तक कि मृत्यु की ताकत भी नाकाम हो गई और वह नासरत का यीशु संसार में अकेला होकर भी जीत गया। अंतिम विजय हर विश्वासी की है, चाहे वह कितना भी अकेला क्यों न हो, चाहे उसे विजय मृत्यु के पार मिले!

(लेखिका नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया के अंतर्गत कमीशन ऑन पोलिसी, गवर्नेंस एंड पब्लिक विटनेस में सेक्रेटरी हैं)

email : anzmas@gmail.com

ईस्टर मृत्यु पर जीवन की विजय का पर्व
यह विजय का पर्व है। मृत्यु पर जीवन की विजय, अंधकार पर उजियाले की विजय, शैतान पर परमेश्वर की विजय और निराशा पर आशा की विजय। यह ईसाइयों का सबसे अर्थपूर्ण पर्व है क्योंकि इतिहासकारों और धर्मशास्त्र के अनुसार यीशु मसीह की मृत्यु हुई, उनको दफनाया गया और फिर वह तीसरे दिन जीवित हो गए।

मत्ती अध्याय के 20:12-19 पद में लिखा है- ‘यीशु यरूशलेम को जाते हुए बारह चेलों को एकांत में ले गया और उनसे कहा- ‘देखो, हम यरूशलम को जाते हैं और मनुष्य का पुत्र (यानी प्रभु यीशु) प्रधान याजको के हाथ पकड़वाया जाएगा और वह उसको घात के योग्य ठहराएंगे और उसको कोड़े मारेंगे और क्रूस पर चढ़ाएंगे और वह तीसरे दिन मुर्दो में से जी उठेगा।’ प्रभु यीशु के बारह शिष्यों में से उनके सर्वाधिक प्रिय शिष्य यहूदा इस्कारियोती ने 30 चांदी के सिक्कों की खातिर प्रभु यीशु को याजको के हाथ पकड़वाया।

प्रभु यीशु का पुनरुत्थान मसीही विश्वास और जीवन का आधार है। भविष्यवाणी की गई थी और स्वयं यीशु मसीह ने भी भविष्यवाणी की थी कि उनकी मृत्यु होगी, उनको दफनाया जाएगा और वह तीसरे दिन जी उठेंगे। यदि यीशु मसीह का पुनरुत्थान न हुआ होता तो बाइबल में लिखी बातें और भविष्यवाणियां असत्य होतीं। यीशु मसीह ने मृत्यु को परास्त किया और वह कहते हैं- ‘जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तो भी जीवित रहेगा।’


मेरे लिए ईश्वर के समान ही पूजनीय हैं ईसा
स्वामी विवेकानंद
स्वयं ईसा ने अपने बारे में कहा है, ‘लोमड़ियों के मांद होती है, नभचारी खगकुल अपने नीड़ में निवास करते हैं, पर मानवपुत्र (ईसा) के पास अपना सिर टेकने तक के लिए स्थान नहीं है।’ ईसा की शिक्षा भी यही है। इसके अतिरिक्त मुक्ति का और कोई पथ नहीं है। यदि हममें इस मार्ग पर अग्रसर होने की क्षमता नहीं है तो हमें मुख में तृण धारण कर विनीत भाव से अपनी यह दुर्बलता स्वीकार कर लेनी चाहिए कि हममें अब भी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के प्रति ममत्व है, हममें धन और ऐश्वर्य के प्रति आसक्ति है।

मेरे लिए ईसा की उपासना करने की केवल एक ही विधि है- उनकी ईश्वर के समान आराधना करना। उनकी अर्चना की और कोई विधि मैं नहीं जानता। क्या तुम कहते हो कि हमें इस प्रकार उनकी उपासना करने का अधिकार नहीं है। यदि हम ईसा को केवल एक महान व्यक्ति मान उनके प्रति कुछ सम्मान प्रदर्शित करने में ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, तो फिर उपासना का प्रयोजन की क्या रह गया। हमारे शास्त्र कहते हैं- ये अनंत ज्योति के पुत्र, जिनमें ब्रह्म की ज्योति प्रकाशित है, आराधित किए जाने पर हमारे साथ तादात्म्य भाव प्राप्त कर लेते हैं।
(1900 ई. लॉस एजिलिस में दिए भाषण से)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:यीशु आज भी जीवन की आशा