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निजामुद्दीन औलियाः सिर्फ मोहब्बत बांटी

सूफ़ीमत परम्परा में किसी व्यक्ति की मृत्यु पर शोक व दुख मनाने के बजाय खुशी मनाई जाती है। सूफि़यों का विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा का परम पुनीत व पवित्र परमात्मा से मिलन होता है यानी आत्मा परमात्मा में समा जाती है या विलीन हो जाती है। स्वयं हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने इस मिलन को रूह यानी आत्मा का परमात्मा से निकाह माना है।

उर्स की शुरुआत तिलावत से होती है अर्थात पवित्र कुरआन शरीफ़ से मृत्युउपरांत की आयतें यानी श्लोक पढ़े जाते हैं। उसके बाद एक कुरआन का हाफिज़ (जिसे कुरआन ज़बानी याद हो) तरन्नुम में पूरा कुरआन पढ़ता है। इसके बाद मज़ार पर हरे रंग की चादर चढ़ाई जाती है। आखिर में समां यानी रूहानी संगीत का सिलसिला शुरू होता है। चिश्तिया सूफ़ीमत में रूहानी संगीत को इंसान के लिए परमात्मा तक पहुँचने का एक साधन माना गया है। निज़ामुद्दीन औलिया के अनुसार समां इंसान के शरीर के लिए एक रूहानी गिज़ा यानी आध्यात्मिक भोजन है। निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शागिर्द अमीर खुसरो द्वारा लिखी हिन्दवी और फ़ारसी की क़व्वालियां उन्हीं के द्वारा अविष्कृत रागों में बाँध कर गायी जाती हैं।

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अक्सर लोगों को हज़रत मुहम्मद की इस मशहूर हदीस (कथन) पर अमल करने को कहते थे- ‘ज़माने को हरगिज़ बुरा मत काहे, ज़माना मैं (खुदा) खुद हूं।’ यह कथन इसी सच्चाई को बताता है कि कालचक्र का कोई भी तत्व और कोई भी पहलू स्वयं किसी कालखण्ड के स्वामित्व में नहीं है बल्कि कर्ता अल्लाह है।

निज़ामुद्दीन औलिया ने अपनी बेपनाह इंसानी मुहब्बत, दर्दमंदी व सहृदयता से धार्मिक सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का एक ऐसा जीवनदायी वातावरण पैदा किया जिसमें हिन्दुस्तान का सांस्कृतिक जीवन इस्लामी सांस्कृतिक जीवन के साथ अन्तरंग हुआ और इस मिलन से एक ऐसी रंगारंग सभ्यता का जन्म हुआ जिसने समाज, संस्कृति, कला, साहित्य, संगीत, निर्माण कला और आम जीवन शैली पर अपने गहरे व यादगार प्रभाव छोड़े।

निज़ामुद्दीन साहब ने साबित किया कि इस दुनिया में रह कर इसकी बुराइयों और इच्छाओं से कैसे पवित्र रहा जा सकता है। ईश्वर के साथ सीधा रिश्ता तभी बन सकता है जब इंसानों के साथ हमारा प्रेम व स्नेह निस्वार्थ हो। जीवन के यही मूल्य मनुष्य के नश्वर जीवन को भी शाश्वत बना देते हैं।

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  • Web Title:निजामुद्दीन औलियाः सिर्फ मोहब्बत बांटी