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‘अरविंद, रविंद्र का प्रणाम स्वीकार करो!’

आज से सौ वर्ष पहले 4 अप्रैल को श्री अरविंद पांडिचेरी पहुंचे। और एक क्रांतिकारी के जीवन में ‘अंतर की क्रांति’ घट गई, जो बीज था उसने फूल का रूप ले लिया और फिर तो पूरी धरा उस सुवास से मुखरित हो उठी। बाहरी दृष्टि से एक भौतिक घटनाक्रम का मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसका कोई महत्व होता है? हालांकि सभी बाह्य घटनाओं का आंतरिक महत्व होता है, किंतु रहस्यवादी और योगी श्री अरविंद की (जो सीधे भागवत चेतना के सम्पर्क में थे) आंतरिक और बाह्य घटनाओं का ज्यादा प्रत्यक्ष महत्व है।

4 अप्रैल 1910 से पहले श्री अरविंद एक क्रांतिकारी राजनेता के रूप में आजादी की सीधी लड़ाई लड़ रहे थे। फिर इस दिन से, उनके पांडिचेरी आगमन के बाद उनका आध्यात्मिक स्वरूप सामने आया, जिसमें वे अध्यात्म क्रांति के अग्रदूत के रूप में हमें दिखाई देते हैं। आध्यात्मिकता का एक ऐसा स्वरूप जिसमें निजी मुक्ति या मोक्ष की चाह नहीं थी, बल्कि जिसका उद्देश्य मानवता को अतिमानसिक रूपांतरण द्वारा नए क्षितिज तक पहुंचाना था। पांडिचेरी प्रवेश के पूर्व श्री अरविंद एक आंतरिक निर्देश से पहले चंदन नगर पहुंचे- ‘चंदन नगर जाओ’ उन्हें स्पष्ट निर्देश मिला।

भागवत निर्देश
भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता से मानवता के आध्यात्मिक रूपांतरण हेतु मुड़ने के विषय में दिलीप कुमार राय को उन्होंने लिखा-‘‘मैंने मानवता की मौलिक प्रकृति और आवेगों में परिवर्तन चाहा था, ताकि सारी बुराइयों को जो हमें प्रभावित करती हैं, उनसे उबरा जा सके.. यह वह उद्देश्य और दृष्टिकोण था जिसके कारण मैं शुरुआत में पांडिचेरी आया और यहीं अपनी खोज करते हुए मुझे स्पष्ट भागवत निर्देश प्राप्त हुआ।’

प्रारंभ से ही योगी
इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि श्री अरविंद का योग पांडिचेरी से प्रारंभ हुआ। वे प्रारंभ से ही योगी थे तथा अपनी युवावस्था से ही योग साधना की ओर मुड़े हुए थे। अपने राजनीतिक कार्यकाल में वे भारत की स्वाधीनता के लिए योग साधना कर रहे थे। उन्हें दृढ़ विश्वास था कि आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा औपनिवेशिक शासन को भारत से बेदखल किया जा सकता है। पांडिचेरी में उनकी योग साधना से उनकी तपस्या का क्षितिज बढ़ जाता है। भारत से सारी मानवता को दिव्यता की ओर ले जाने के उद्देश्य को लेकर उन्होंने अपना शेष जीवन पांडिचेरी में बिताया।

टैगोर जान गए थे अरविंद की चेतना का स्तर
पांडिचेरी में, जिसे उन्होंने अपनी ‘तपस्या की गुफा’ कहा है, श्री रविन्द्रनाथ टैगोर उनसे मिले थे। उनकी टिप्पणी से हमें इस आंतरिक परिवर्तन व रूपांतरण की झलक मिलती है जो उनकी चेतना में घटित हो रहे थे, जब वे कलकत्ता से पांडिचेरी आये। गुरुदेव रविंद्रनाश के शब्द हैं- ‘प्रथम दृष्टि में ही मैं जान गया उन्होंने आत्मा की खोज कर उसे प्राप्त कर लिया था। और संसिद्धि की इस लंबी प्रक्रिया ने उनके भीतर प्रेरणा की शक्ति को ला दिया था। उनका चेहरा एक आंतरिक प्रकाश से दमक रहा था। मैंने अनुभव किया कि उनके द्वारा प्राचीन हिंदू ऋषियों की वह पूर्ण समतायुक्त वाणी प्रकट हो रही थी जो मानव आत्मा को ‘सर्व’ में प्रवेश कराती है।’

‘वर्षो पहले मैंने अरविंद को उनके शुरुआती युवा नायकीय वातावरण में देखा था और मैंने उनके लिए गाया था.. ‘अरविंद, रविन्द्र का प्रणाम स्वीकार करो।’ आज मैंने उन्हें शांत ज्ञान से आप्लावित गहरे और गंभीर वातावरण में देखा और पुन: मैं मौन ही गा उठा, ‘अरविंद, रविन्द्र का प्रणाम स्वीकार करो।’

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