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सबको पढ़ाया पर अपने बच्चे ही छूटे

एक शिक्षक,जो खुद दूसरे के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाता है। आज उसी के बच्चों पढ़ने को मोहताज हो गए हैं। एक प्राइवेट स्कूल की तानाशाही की वजह से उनके  बच्चोंको स्कूल से भगा दिया गया। शिकायत लेकर अफसरों के दरवाजों पर दस्तक देकर थक चुके शिक्षक पिता ने अपनी गुहार प्रधानमंत्री से लगाई है।


एक ओर सरकार  बच्चोंको पढ़ाने के लिए प्रयत्नशील हैं। वही दूसरी ओर स्कूल प्रबंधन अपनी तानाशाही रवैये से  बच्चोंका भविष्य बिगाड़ने में लगा हुआ है। साहिबाबाद के श्यामपार्क मेन में रहने वाले हाकिम सिंह यादव की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। हाकिम सिंह दिल्ली के सीमापुरी इलाके के राजकीय उ.मा. विद्यालय में गणित के अध्यापक हैं। उनके तीन बच्चाे श्यामपार्क मेन स्थित एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। बेटी पूजा कक्षा 9 की छात्र है और बेटा प्रशांत कक्षा 6 में पढता है। आरोप है कि स्कूल की फीस देने में देरी होने पर  दोनों  बच्चोंको मार्च में होने वाली परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया और भगा दिया गया। जबकि उन्होंने किसी तरह जुटाकर 15 हजार रुपये का चेक मैनेजमेंट को दे दिया था। उनके चेक को मैनेजमेंट द्वारा नकली करार दिया गया। अध्यापक हाकिम सिंह ने बताया कि इसकी शिकायत उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक से की। शर्मनाक बात यह रही कि मैनेजमेंट द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेशों की अवहेलना की गई। बाद में इसकी शिकायत डीएम से भी की गई। डीएम ने तत्काल जिला विद्यालय निरीक्षक को कार्रवाई का निर्देश दिया। इसके बाद भी कोई नतीजा निकल कर सामने नहीं आया। चारों तरफ से निराश हो चुके पीड़ित पिता हाकिम सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर न्याय की गुहार लगाई है। अध्यापक हाकिम सिंह बताते है पेशे से अध्यापक होने के बावजूद मेरे  बच्चोंका भविष्य अंधकारमय हो रहा है। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री जी इस मामले को अमल में लाएंगे। और स्कूल की तानाशाही के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।

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