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अभी बहुत कुछ होना है संसद में

राजनैतिक गतिविधियां इन दिनों ठंडी पड़ी हैं। 15 अप्रैल को जब संसद फिर से बजट पर बहस के लिए बैठेगी तो उसका मुख्य लक्ष्य होगा वित्त विधेयक को पास करना। फिलहाल विभिन्न मंत्रालयों की स्थाई संसदीय समितियां अनुदान मांगों पर विचार कर रही हैं। सत्र के फिर से शुरू होते ही वे अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप देंगी। सत्र के बाकी बचे भाग ने कईं मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे।

पहला और सबसे महत्वपूर्ण तो खैर वित्त विधेयक ही होगा। आमतौर पर स्थाई समितियां मंत्रलय के कामकाज पर गहन विचार करती हैं और वे बजट प्रावधानों में ज्यादा फेरबदल नहीं करतीं। बजट ही बातचीत और इसके बाद के चिंतन से तैयार होता है, संसद की अनुमति लेते समय वित्त मंत्री आमतौर पर इसमें छोटे मोटे बदलाव ही करते हैं। इस बार वामपंथी दल यह कोशिश जरूर करेंगे कि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर बढ़ाए गए शुल्क को वापस ले।

इस काम में उन्हें राजग, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का भी सहयोग मिल सकता है। वे पार्टियां भी उनके साथ खड़ी हो सकती हैं जो महिला आरक्षण बिल के चलते उनसे अलग छिटक गईं थीं। अगर ऐसा होता है तो लोकसभा में सरकार के पास काफी हल्का बहुमत ही बचेगा। हालांकि वित्त विधेयक को पास करने के लिए साधारण बहुमत की ही जरूरत है इसलिए ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

वैसे यह अटकल भी लगाई जा रही है कि जब तक वित्त विधेयक पास नहीं हो जाता सरकार महिला आरक्षण विधेयक को तब तक के लिए टाल देगी। यह भी हो सकता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री की तरह ही वित्तमंत्री भी बढ़ाए गए कुछ शुल्क को वापस ले लें या उनमें कुछ कटौती कर दें। मेरी अपनी राय यह है कि ऐसी कटौती या वापसी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जो बढ़ोत्तरी हुई है वह तेल कंपनियों के घाटे को पूरा करने लायक नहीं है।

दूसरे सरकार शिक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण कानून ला सकती है। यह विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक से संबंधित होगा। एक ऐसी नियामक संस्था बनाने के लिए जो उच्च शिक्षा को देखे, यह संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और एआईसीटीई की जगह लेगी। इसके अलावा शिक्षा के ट्रिब्यूनल के गठन की भी कोशिश हो सकती है जो शिक्षा से जुड़े विवादों को निपटाएगा।

एक बिल उन विश्वविद्यालयों को दंडित करन के लिए होगा जो अनियमित फीस आदि मामलों में दोषी पाए जाएंगे। संभावना यही है कि ये सारे बिल संसदीय स्थाई समिति के हवाले कर दिए जाएंगे। इन समितियों की सिफारिशों के बाद वे मानसून सत्र से पहले दुबारा संसद में पेश नहीं हो पाएंगे।

इन चार विधेयकों में सबसे विवादास्पद होगा विदेशी विश्वविद्यालय का विधेयक, वामपंथी दलों को इनपर वैचारिक आपत्तियां हैं। स्थाई समिति में और संसद के बाहर इस पर जो बहस होगी उम्मीद है उससे एक आम सहमति बनेगी। उच्च शिक्षा आयोग बनाने के विधेयक पर ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि हर कोई वर्तमान व्यवस्था को बदलने पर सहमत है। इसके लिए एक संगठन हो या एक से ज्यादा संगठन हो इसपर कुछ मतभेद जरूर हैं।

तीसरे सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक भी पेश कर सकती है जिसमें गरीबी की रेखा से नीचे वालों को तीन रुपये प्रति किलो की दर से 25 किलो अनाज देने का प्रावधान होगा। इसके विभिन्न मुद्दों पर काफी मतभेद हैं। कईं जगह 35 किलो अनाज दिया जा रहा है जो इसके बाद घटकर 25 किलो हो जाएगा। मतभेद इस पर भी हैं कि खाद्य सुरक्षा की परिभाषा क्या हो। इसमें पौष्टिकता की कमी और सेहत वगैरह को भी रखा जाए या नहीं।

बीपीएल परिवारों के आकलन और उनके लिए दी जाने वाली सबसिडी की मात्र पर भी विवाद हैं। इन सब मसलों पर किसी भी तरह की आम सहमति नहीं है। सबसे ज्यादा विवाद इसे लेकर है कि बीपीएल परिवारों का आकार क्या हो और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कैसे चलाया जाए। एक सुझाव यह है कि धीरे धीरे वाउचर व्यवस्था की ओर बढ़ा जाए या ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे जरूरतमंद परिवार के पास सबसिडी नगदी धन के रूप में पंहुच जाए।

बजट के साथ ही पेश होने वाले इकॉनमिक सर्वे में सबसिडी प्रशासन बड़े बदलाव के तर्क दिए गए थे। खासतौर पर खाद्यान्न और उर्वरक की सबसिडी के वाउचर जारी करने से यह सीधे किसानों तक पंहुच सकेगी। जब तक यह मसले नहीं सुलझते खाद्य सुरक्षा विधेयक को किसी जल्दबाजी में नहीं पास किया जाना चाहिए। इसमें एक जटिलता उच्चतम न्यायालय के उस फैसले की वजह से भी है जो एक सार्वजनिक हित की याचिका पर उसने दिया है। अदालत का कहना है कि जीवन का अधिकार भुखमरी से बचने के लिए खाद्य के अधिकार बिना मुमकिन नहीं है।

बजट प्रस्तावों में पर्यावरण प्रबंधन और ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे कईं मसले भी उठाए गए हैं। इनमें भी बहुत सारे विवादास्पद मसले हैं लेकिन फिर भी इनके पास हो जाने की उम्मीद है। दरअसल अभी पर्यावरण परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से संबंधित कई नए कानून बनाए जाने हैं। हालांकि इन सभी के बजट सत्र में पेश होने की उम्मीद नहीं है।

और सबसे आखिर में बजट में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव ऐसा है जिस पर सरकार ने काफी कोशिश की है। इसमें एक है खर्च के प्रबंधन को वित्तीय उत्तरदायित्व के भीतर ही रखना। पहली बार मंत्रियों को जवादेह बनाया जा रहा है। पहली बार अब उन्हें हर साल एक निश्चित समय सीमा के बीच हासिल किए गए लक्ष्यों का लेख-जोखा देना होगा। अगर ये प्रस्ताव गंभीरता से लागू किए गए तो इनके बहुत अच्छे नतीजे आएंगे।

इसी तरह से इकॉनमिक सर्वे में नए कारोबार शुरू करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में आड़े आने वाली नौकरशाही प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने का भी प्रस्ताव है। यह भी कहा गया है कि इसके लिए श्रम कानूनों में बदलाव और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में संशोधन किया जाए। इकॉनमिक सर्वे का मानना है कि श्रम कानूनों में बदलाव से रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा किए जा सकते हैं और इससे श्रमिकों को आर्थिक फायदा भी मिलेगा। यानी संसद के बाकी बचे सत्र का इंतजार ढेर सारे काम कर रहे हैं। इसमें से कितने काम हो पाते हैं, या कितने काम रह जाते हैं यह बहुत कुछ यूपीए की फ्लोर मैनेजमैंट क्षमताओं पर निर्भर करेगा।

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लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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