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वारिस की दुविधा में फंसे करुणानिधि

अब हिसाब-किताब का समय आ चुका है और फैसले को ज्यादा देर तक टाला नहीं जा सकता। द्रमुक के कुलपिता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को लंबे समय से परेशानी का कारण बने उत्तराधिकार के मामले का हल निकालना ही होगा। पिछले हफ्ते यह विवाद फिर उठा जब उनके बड़े बेटे और केंद्रीय मंत्री एमके अलागिरी ने एलान कर दिया कि वे अपने पिता के अलावा किसी और को पार्टी के नेता के तौर पर स्वीकार नहीं करेंगे।

एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि करुणानिधि के अलावा और कोई भी पार्टी को चलाने की स्थिति में नहीं है। इस तरह उन्होंने अपनी बात साफ तरीके से कह दी। उनका आशय था कि वे अपने छोटे भाई और तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री एमके स्टालिन को अपने पिता के उत्तराधिकारी के तौर पर स्वीकार नहीं करेंगे।

तमिलनाडु में करुणानिधि के संतानों की प्रतिद्वंद्विता को जो भी जानता है उसके लिए यह बयान कोई चौंकाने वाला नहीं है। लेकिन इस बयान से बड़ी मेहनत से बनाया गया यह आभास तार-तार हो गया है कि इस मुद्दे का पिछले साल हल निकाला जा चुका है।

पिछले साल जब अलागिरी को लोकसभा का सदस्य बनाकर दिल्ली भेजा गया और उन्हें मनमोहन सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा और उधर एमके स्टालिन को करुणानिधि सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाया गया तो लगा कि विवाद का अंत हो चुका है। अलागिरी ने इस स्पष्ट रुख का एलान पिता के उस बयान के चार माह बाद किया है कि वे अपने साहित्यिक कामों पर समय लगाने के लिए सक्रिय राजनीति से रिटायर होने वाले हैं।

तमिलनाडु में यह बात हर किसी को पता है कि करुणानिधि अपने अपेक्षाकृत छोटे बेटे स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं। स्टालिन ने पार्टी की युवा शाखा के प्रमुख के तौर पर पिता की पार्टी के काम में मदद की है। इसी के साथ यह आभास भी दिया जा रहा है कि अलागिरी को द्रमुक से दूर किया जा रहा है। सन 2000 में द्रमुक ने अलागिरी पर पार्टी का अनुशासन तोड़ने का आरोप लगाया था।

द्रमुक महासचिव के. अनबाझगन ने 2003 में पार्टी के कार्यकर्ताओं को एक आदेश जारी कर कहा था कि वे अलागिरी के साथ कोई संबंध न रखें। दरअसल इस बात की आमचर्चा थी कि दिसंबर 2007में तिरुनवेली में होने वाले युवकों के सम्मेलन में करुणानिधि औपचारिक तौर पर स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करेंगे। लेकिन तब स्टालिन के तमाम समर्थकों को घोर निराशा हुई जब मुख्यमंत्री ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा कि उनकी आशाएं जल्दी ही पूरी होंगी।

लेकिन तमिलनाडु के इस राजनीतिक परिवार के आंतरिक संबंध कुछ महीनों में तेजी से बदले जब अलागिरी के समर्थकों ने अपना रोष व्यक्त करने के लिए उपद्रव मचाया। मारन बंधुओं के संचालन में चलने वाले एक अखबार और टीवी चैनल ने जनमत संग्रह छापकर यह बताने की कोशिश की कि लोग स्टालिन को करुणानिधि का उत्तराधिकारी मानते हैं। इसके जवाब में अलागिरी के लोगों ने अखबार और चैनल के मदुराई दफ्तर में तोड़फोड़ की।

इस हमले का असर यह रहा कि मारन द्रमुक के प्रमुख करुणानिधि से चिढ़ गए और इस बीच उनकी बेटी कनिमोझी राजनीतिक क्षेत्र में एक खिलाड़ी के तौर पर आ गई। जबकि अलागिरी पार्टी के मामलों में एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभर गए। इस स्थिति को शांत करने के लिए करुणानिधि ने अपने दोनों प्रतिद्वंद्वी बेटों के बीच राजनीतिक क्षेत्रधिकार का बंटवारा कर दिया। उन्होंने अलागिरी को दिल्ली में पार्टी का प्रतिनिधित्व सौंपा और राज्य में स्टालिन को कमान दे दी। लेकिन यह व्यवस्था कुछ ही महीनो में कमजोर पड़ गई क्योंकि भाषा संबंधी समस्या के चलते अझगिरी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान नहीं बना सके।

उधर परिवार की भीतरी खींचतान को देखते हुए सन 2011 के मध्य तक होने वाले आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के पहले रिटायर होने की योजना बना चुके ने रणनीतिक तौर पर अपने कदम पीछे खींच लिए। उन्होंने घोषणा कर डाली कि वे अभी रिटायर नहीं होने जा रहे हैं। पर यह बात किसी से छुपी नहीं है कि करुणानिधि इस समय उन पार्टियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं जहां एक परिवार का प्रभुत्व है।

इस मायने में कर्नाटक के जनता दल(एस) की स्थिति उनके काफी करीब बैठती है। जिस तरह करुणानिधि को अपने दो बेटों के बीच पंचायत करनी पड़ती है उसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडीदेवगौड़ा को भी राजनीति में आए दो बेटों का विवाद निपटाना पड़ता है। लेकिन तमिलनाडु की स्थिति इस मामले में अलग है कि वहां करुणानिधि ज्यादा समय तक इंतजार नहीं कर सकते।

radhaviswanath73@yahoo.com
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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