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ये कैसा अकेलापन

बेटा, क्या सारा दिन इंटरनेट खोल कर बैठे रहते हो? शाम हो रही है, देखो तुम्हारे दोस्त खेल रहे हैं। परेशान मां अपने बड़े होते बच्चे से कहती है। बच्चा मुंह बनाता है। फिर नेट पर सर्फिग करने लगता है। थोड़ी देर के बाद मां फिर आती है। बच्चा बेमन से उसे बंद कर देता है। लेकिन खेलने नहीं जाता।

क्या इंटरनेट पर ज्यादा वक्त बिताने से जिंदगी में अकेलापन बढ़ता है? क्या आप सचमुच दुनिया से जुड़ने के बजाय कटने लगते हैं? इंटरनेट आया था, तो उसका मकसद दुनिया को जोड़ना ही था। ‘कंप्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर’ पत्रिका के लिए साउथ कैरोलिना की इरीना स्तेपानिकोवा ने एक रिसर्च की है।

उसके मुताबिक इंटरनेट के ज्यादा इस्तेमाल से अकेलापन तो बढ़ता ही है। एक और बड़ी दिक्कत होती है। वह है जिंदगी से संतुष्ट न होने की भावना। जॉन कैचिओप्पो ने बेहतरीन किताब लिखी है ‘लोनलीनेस।’ उनका कहना है कि अगर फेसबुक पर आपके चार हजार दोस्त हैं। और साथ उठने-बैठने वाला एक दोस्त नहीं है, तो आप अकेले हैं।
 
टीवी जब हमारी जिंदगी में आया था, तब भी इसी तरह की बातें होती थीं। लोग परेशान थे कि असल जिंदगी से वह कुछ छीन रहा है। टीवी हो या इंटरनेट वह हमारे लिए है। हम उसके लिए नहीं हैं। वह हमारी जिंदगी में शामिल है। वह हमारी जिंदगी नहीं है।

जिंदगी जीने के लिए एक संतुलन चाहिए। संतुलन बिगड़ेगा तो जिंदगी पर भी असर पड़ेगा। जिंदगी जीने का मतलब है जिया गया मानवीय समय। वह हमें अपने रिश्तों में ही मिलता है। घर- परिवार और समाज के रिश्ते। हम अपने वक्त को कैसे भी जी लें, लेकिन अगर रिश्तों में नहीं जीते हैं, तो अकेलापन महसूस होगा ही। आखिर कोई मशीन मनुष्य की जगह नहीं ले सकती।

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