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शिक्षा का नया सवेरा

देश के छह से चौदह साल तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दिए जाने को मौलिक अधिकार बनाया जाना सचमुच शिक्षा क्षेत्र के नए सवेरे की तरह है। इस सुबह को लाने के लिए तमाम लोग वर्षो से सक्रिय थे और उन्हें उम्मीद थी कि यह सुबह कभी तो आएगी। खुशी इस बात की है कि वह सुबह अब आ गई है और उसका भरपूर आनंद लियाजाना चाहिए। 

लेकिन उसी के साथ इस बात का मलाल भी है, उसे आने में बहुत देर लगी है। साथ में यह सवाल भी है कि  इतनी देर से आने के बाद भी क्या वह सचमुच दुरुस्त होकर आई है? उम्मीदों को देखते हुए भारतीय लोकतंत्र की इस महान उपलब्धि पर जय-जयकार होनी चाहिए और वह हो भी रही है।

लेकिन आशंकाओं को देखते हुए हमें जोश के साथ उस होश को बरकरार रखना चाहिए जिसके बिना यह उपलब्धि तमाम अन्य उपलब्धियों की तरह एक अधूरा सपना बनकर रह सकती है। मानव संसाधन मंत्रालय का दावा है कि देश में छह से 14 साल की आयु वर्ग के बच्चों की संख्या 22 करोड़ के आसपास है और उसमें करीब एक करोड़ ऐसे हैं जो अपनी सामाजिक आर्थिक स्थितियों के चलते स्कूल नहीं जा पाते।

उम्मीद जताई जा रही है कि इस कानून से उन एक करोड़ बच्चों का सर्वाधिक भला होगा और भारत के माथे पर लगा निरक्षरता का कलंक भी मिटेगा। लेकिन गैर-सरकारी संगठनों और विश्व बैंक के अनुसार स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है और उन्हें स्कूल के दायरे में लाने के लिए महज औपचारिक घोषणा से काम नहीं चलने वाला है। 

उसके लिए न सिर्फ पर्याप्त संसाधन झोंकने होंगे बल्कि उनका सदुपयोग करने के लिए ईमानदार व सक्षम शिक्षक और समर्पित कर्मचारी भी तैयार करने होंगे। क्या केंद्र सरकार, राज्य सरकार और निजी व गैर सरकारी संगठन इस काम में पूरी लगन के साथ लगने को तैयार हैं? यह एक गंभीर सवाल है और जब तक इसका जवाब हां में नहीं होगा तब तक इस क्रांतिकारी मौलिक अधिकार के सफल होने पर सवालिया निशान बना रहेगा।

शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने वाले इस कानून ने निजी स्कूलों पर यह जिम्मेदारी डाली है कि वे समाज के वंचित वर्ग के 25 प्रतिशत बच्चों को अपने यहां मुफ्त में शिक्षा देंगे। निजी स्कूल इस साल तो इस जिम्मेदारी से बच गए हैं लेकिन अगले साल जब इसे लागू करने का मौका आएगा तो वे कई अड़ंगे लगा सकते हैं। कुछ पब्लिक स्कूलों ने इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए याचिका भी दायर कर दी है।

असली सवाल ट्यूशन फीस के आगे वसूले जाने वाले शुल्क का है। वह माफ नहीं होगा और उसे दे पाना वंचित वर्ग के सामर्थ्य में होगा नहीं। जबकि बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाने का यह एक महत्वपूर्ण रास्ता है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर पहले से ही बहुत खराब है। इसलिए उसके माध्यम से शिक्षा के मौलिक अधिकार का फायदा उठाने वाले बच्चे उन बच्चों से बहुत कमजोर शिक्षा पा रहे होंगे जो सामान्य अधिकार के तहत विशिष्ट संस्थानों में दाखिल होते हैं। इससे तो बेहतर नागरिक बनाने और बराबरी लाने का प्रधानमंत्री का आह्वान अधूरा ही रहेगा। इसलिए शिक्षा की उपलब्धता के साथ उसकी गुणवत्ता के फर्क को भी मिटाना होगा। वरना शिक्षा गैर-बराबरी पैदा करने का उपकरण बनकर रह जाएगी।

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